कहा कि साहित्य मानवीय संवेदनाओं का विस्तार है. उनका एक वाक्य पूरे आयोजन का सार बन गया- “साहित्य ‘मैं’ से ‘हम’ तक की यात्रा है.” उन्होंने ‘देहाती दुनिया’ की सौ साल की यात्रा को हिंदी साहित्य की युगांतरकारी उपलब्धि बताया.

‘मैं’ से ‘हम’ तक की यात्रा... शिवपूजन सहाय के गांव, समाज और राष्ट्रवाद पर विद्वानों ने खोले सौ साल पुराने पन्ने
‘मैला आंचल’ से तीन दशक पहले लिखी गई थी साहित्यिक क्रांति, युवाओं ने भी संभाला मंच और छेड़ा नया विमर्श
बक्सर टॉप न्यूज़, बक्सर : महर्षि विश्वामित्र महाविद्यालय के मानस सभागार में सोमवार को साहित्य का ऐसा ‘रीडिस्कवर मोमेंट’ देखने को मिला, जहां सौ साल पुरानी किताब आज के दौर में फिर चर्चा के केंद्र में आ गई. महाविद्यालय परिवार और ‘स्त्री दर्पण’, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में आचार्य शिवपूजन सहाय स्मृति पर्व समारोह सह राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित हुई. संगोष्ठी का केंद्र हिंदी साहित्य के प्रथम आंचलिक उपन्यास माने जाने वाले ‘देहाती दुनिया’ के सौ वर्ष रहे. विद्वानों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने कृति के साहित्यिक, सामाजिक और ऐतिहासिक पक्षों पर मंथन किया, वहीं शताब्दी वर्ष के मौके पर विशेष पुस्तिका का विमोचन भी हुआ.
‘साहित्य मैं से हम तक की यात्रा है’
संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए प्रोफेसर डॉ. कृष्णा कांत सिंह ने साहित्य को केवल शब्दों का खेल मानने से इनकार किया. उन्होंने कहा कि साहित्य मानवीय संवेदनाओं का विस्तार है. उनका एक वाक्य पूरे आयोजन का सार बन गया- “साहित्य ‘मैं’ से ‘हम’ तक की यात्रा है.” उन्होंने ‘देहाती दुनिया’ की सौ साल की यात्रा को हिंदी साहित्य की युगांतरकारी उपलब्धि बताया.
‘देहाती दुनिया’ ने बहुत पहले दिखा दिया था गांव का असली चेहरा
मुख्य वक्ता वरिष्ठ पत्रकार एवं कवि विमल कुमार ने आचार्य शिवपूजन सहाय के जीवन और साहित्य से जुड़े कई ऐसे पहलुओं को सामने रखा, जो आम पाठकों की नजर से दूर रहे हैं. उन्होंने आलोचक खगेल ठाकुर और साहित्यकार दूधनाथ सिंह के संदर्भों का उल्लेख करते हुए बताया कि दूधनाथ सिंह ने ‘देहाती दुनिया’ को हिंदी का पहला आंचलिक उपन्यास स्वीकार किया था.
उन्होंने कहा कि 11 अध्यायों और शीर्षकों में बंटी यह रचना अपने समय के ग्रामीण जीवन की महज कहानी नहीं थी, बल्कि गांव के समाज, उसकी जटिलताओं और तत्कालीन भारत की तस्वीर का दस्तावेज थी. इसे ‘कथा डायरी’ मानने वाले आलोचकों ने भी साहित्य में एक नया विमर्श खड़ा किया.
सरकारी नौकरी छोड़ी, हिंदी सेवा को बनाया जीवन का मिशन
विमल कुमार ने शिवपूजन सहाय के राष्ट्रप्रेम पर भी प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की तरह शिवपूजन सहाय ने भी राष्ट्रहित में सरकारी नौकरी छोड़ दी थी. उर्दू के प्रकांड विद्वान होने के बावजूद उन्होंने हिंदी को राष्ट्र की पहचान से जोड़ा और जीवनभर हिंदी सेवा में समर्पित रहे.
उन्होंने स्वामी सहजानंद सरस्वती को लिखे सहाय जी के दुर्लभ पत्रों का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसे कई महत्वपूर्ण दस्तावेज आज भी अप्राप्य हैं. सहाय जी के आग्रह पर उनके दामाद द्वारा लंदन से मुंशी सदालाल की दुर्लभ पुस्तकें मंगाए जाने का प्रसंग भी उन्होंने साझा किया.
विमल कुमार ने कहा कि स्वतंत्रता-पूर्व की ‘देहाती दुनिया’ और स्वतंत्रता-उत्तर फणीश्वरनाथ रेणु की ‘मैला आंचल’ को साथ रखकर पढ़ने पर औपनिवेशिक भारत और ग्रामीण समाज की पूरी तस्वीर सामने आती है.
परिवार की अगली पीढ़ी ने सुनाए अनछुए किस्से
आचार्य शिवपूजन सहाय की प्रपौत्री लक्ष्मी सहाय ने मंच से सहाय जी के परिवार और निजी जीवन से जुड़े कई अनछुए पहलुओं को साझा किया. उन्होंने कहा कि मुंशी प्रेमचंद की तरह शिवपूजन सहाय के चिंतन और लेखन का केंद्र भी ग्रामीण जीवन रहा.
उन्होंने बताया कि सहाय जी से जुड़ी दुर्लभ स्मृतियां और पांडुलिपियां आज भी माइक्रोफिल्म के रूप में सुरक्षित हैं. परिवार की ओर से पहुंचे अतुल जी की मौजूदगी ने कार्यक्रम को भावनात्मक स्पर्श दिया.
‘मैला आंचल’ से 30 साल पहले आ चुकी थी साहित्यिक क्रांति
विषय विशेषज्ञ प्रोफेसर डॉ. मृत्युंजय सिंह ने कहा कि साहित्य में भाषा को समृद्ध करने के लिए गद्य का विकास बेहद जरूरी है और शिवपूजन सहाय के लेखन में इसकी शानदार झलक मिलती है.
उन्होंने बताया कि ‘देहाती दुनिया’ का लेखन 1921-22 के आसपास हुआ और 1926 में इसका प्रकाशन हुआ. उन्होंने आचार्य रामचंद्र शुक्ल के साहित्य इतिहास में शिवपूजन सहाय को अपेक्षित स्थान नहीं मिलने पर चिंता जताई.
उनका कहना था कि ‘मैला आंचल’ से करीब तीन दशक पहले ‘देहाती दुनिया’ का आना किसी साहित्यिक क्रांति से कम नहीं था. उन्होंने नई पीढ़ी से शिवपूजन सहाय की रचनाओं को फिर से पढ़ने और उनका निष्पक्ष पुनर्मूल्यांकन करने का आह्वान किया.
प्रेमचंद से भिखारी ठाकुर तक, साहित्य की सामाजिक परंपरा पर चर्चा
प्रोफेसर रवींद्रनाथ राय ने प्रेमचंद, राहुल सांकृत्यायन, शिवपूजन सहाय और भिखारी ठाकुर की साहित्यिक परंपरा को नमन किया. उन्होंने कहा कि इन साहित्यकारों ने अपनी कलम से समाज की विकृतियों को उजागर किया. उन्होंने ऐसे समतामूलक समाज की जरूरत बताई, जहां स्त्रियां यातना के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद कर सकें.मंच पर मौजूद जितेंद्र कुमार ने भी अपने विचारों से संगोष्ठी को वैचारिक मजबूती दी.
जब विद्यार्थियों ने संभाला माइक, सभागार में दिखा नया जोश
संगोष्ठी में सिर्फ वरिष्ठ विद्वानों की आवाज नहीं गूंजी, बल्कि नई पीढ़ी ने भी पूरे आत्मविश्वास के साथ अपनी बात रखी. बीए सेमेस्टर-5 के विद्यार्थी विकास कुमार और एमए हिंदी के छात्र अभिषेक कुमार ने ‘देहाती दुनिया’ के प्रासंगिक आयामों पर विचारोत्तेजक वक्तव्य दिए. युवा वक्ताओं की प्रस्तुति ने सभागार में मौजूद लोगों का ध्यान खींचा और साहित्य के प्रति नई पीढ़ी की रुचि को सामने रखा.
कार्यक्रम का संचालन डॉ. पंकज कुमार चौधरी ने बेहद प्रभावी और सुव्यवस्थित ढंग से किया. समापन पर डॉ. श्वेत प्रकाश ने अतिथियों, विद्वानों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों और उपस्थित लोगों के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया.
कार्यक्रम में महाविद्यालय के विभिन्न विभागों के प्राध्यापक, शोधार्थी और सैकड़ों छात्र-छात्राएं मौजूद रहे. मानस सभागार में चले इस साहित्यिक मंथन ने साफ कर दिया कि ‘देहाती दुनिया’ के सौ साल पूरे जरूर हो गए हैं, लेकिन इसकी कहानी और सवाल आज भी पुराने नहीं हुए हैं.





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