82 की उम्र में भी शब्दों से नई पीढ़ी को राह दिखा रहे धन्नू लाल ‘प्रेमातुर’ ..

उनका मानना है कि तकनीक उपयोगी है, लेकिन इसका अत्यधिक इस्तेमाल मनुष्य की अपनी सोचने, लिखने और पढ़ने की क्षमता को कमजोर कर सकता है. इसलिए तकनीक का इस्तेमाल करते हुए भी मनुष्य को अपनी मौलिक क्षमता और सृजनशीलता को बचाए रखना चाहिए.





                           



  • बचपन में मां का साया उठा, जीवन में प्रेम की कमी ने बना दिया ‘प्रेमातुर’
  • 1966 से 2003 तक शिक्षक रहे, अब साहित्य और लेखन को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने में जुटे

बक्सर टॉप न्यूज़, बक्सर : उम्र करीब 82 वर्ष, लेकिन कलम आज भी उतनी ही सक्रिय है. चमेली गांव के रहने वाले धन्नू लाल ‘प्रेमातुर’ उन लोगों में हैं, जिन्होंने जीवन के अनुभवों को साहित्य की संवेदना में ढाला और अब अपनी लेखनी के माध्यम से नई पीढ़ी से संवाद कायम रखने में जुटे हैं. राजकीय माध्यमिक विद्यालय सैंसड़ में वर्ष 1966 से 2003 तक संस्कृत और हिन्दी शिक्षक के रूप में सेवाएं देने वाले धन्नू लाल आज भी पढ़ने-लिखने और साहित्य के प्रति उसी समर्पण के साथ सक्रिय हैं.

धन्नू लाल के जीवन की शुरुआत ही संघर्ष और अभाव के बीच हुई. बचपन में ही उनकी मां का निधन हो गया. पिता रघुवीर लाल नौकरी करते थे. ऐसे में बचपन में मां के स्नेह और पारिवारिक समय का अभाव उनके मन पर गहरी छाप छोड़ गया. जीवन में प्रेम की इस कमी से जुड़ा अनुभव ही आगे चलकर उनके नाम के साथ ‘प्रेमातुर’ उपनाम के रूप में जुड़ गया.

शिक्षक के रूप में करीब चार दशक तक उन्होंने विद्यार्थियों को हिन्दी और संस्कृत पढ़ाई. उनके लिए शिक्षा केवल पाठ्यक्रम पूरा करने का माध्यम नहीं रही, बल्कि भाषा, साहित्य और संस्कारों से नई पीढ़ी को जोड़ने का जरिया भी रही. सेवानिवृत्ति के बाद भी उनका साहित्य से रिश्ता कमजोर नहीं हुआ, बल्कि समय के साथ और गहरा होता गया.

आज भी धन्नू लाल ‘प्रेमातुर’ साहित्यिक गतिविधियों में सक्रिय रहते हैं. विभिन्न साहित्यिक आयोजनों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं और लगातार लिखते रहते हैं. उनका मानना है कि साहित्य समाज को दिशा देने वाली रोशनी है और यह रोशनी आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचनी चाहिए.

बदलते दौर और तकनीक के बढ़ते प्रभाव के बीच वह कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर भी चिंतन करते हैं. अपने प्रबुद्ध मित्रों के साथ होने वाली चर्चाओं में वह इसके संभावित प्रभावों पर विचार करते हैं. उनका मानना है कि तकनीक उपयोगी है, लेकिन इसका अत्यधिक इस्तेमाल मनुष्य की अपनी सोचने, लिखने और पढ़ने की क्षमता को कमजोर कर सकता है. इसलिए तकनीक का इस्तेमाल करते हुए भी मनुष्य को अपनी मौलिक क्षमता और सृजनशीलता को बचाए रखना चाहिए.

82 वर्ष की उम्र में सोशल मीडिया, खासकर फेसबुक पर उनकी सक्रियता भी इसी सोच का हिस्सा है. वह इसके जरिए नई पीढ़ी से जुड़े रहना चाहते हैं और साहित्य को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं. वह लगभग हर दिन कुछ न कुछ लिखते हैं. उनके लेखन में जीवन के अनुभव, सामाजिक सरोकार और साहित्य के प्रति उनकी प्रतिबद्धता दिखाई देती है.

दिलचस्प बात यह है कि अपनी साहित्यिक रचनाओं को स्वयं प्रकाशित कराने की उनकी विशेष इच्छा कभी नहीं रही. उनके लिए रचना का उद्देश्य उसका प्रकाशन या प्रसिद्धि हासिल करना नहीं, बल्कि विचारों और संवेदनाओं को समाज तक पहुंचाना रहा है. यही कारण है कि वे आज भी बिना किसी औपचारिक प्रचार के लगातार लिख रहे हैं.

धन्नू लाल ‘प्रेमातुर’ का जीवन बताता है कि उम्र केवल शरीर की सीमा तय कर सकती है, विचारों और सृजन की नहीं. एक शिक्षक से साहित्य साधक बने धन्नू लाल आज भी अपनी कलम के जरिए समाज और नई पीढ़ी के बीच संवाद बनाए हुए हैं.
















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