अंग्रेजी के बढ़ते दबदबे के बीच हिंदी पर मंथन, बोले प्रो. तिवारी- लोक से कटेगी तो कमजोर होगी भाषा ..

उन्होंने कहा कि भोजपुरी में लोग पहले गाकर सीखते हैं. भाषा के प्रति लोगों में उत्साह कम होना चिंता का विषय है. शासन की नीतियां भी कई बार भाषाओं को कमजोर करती हैं.





                           



  • हिंदी दिवस पर साहित्यकारों ने कहा- हीनभावना छोड़ें, रोजमर्रा के जीवन में हिंदी का इस्तेमाल बढ़ाएं
  • राजकीय अनुमंडलीय पुस्तकालय में विचार से लेकर कविता तक हिंदी के नाम रही शाम, छात्राओं की नृत्य-नाटिका ने मोहा मन

बक्सर टॉप न्यूज, बक्सर : अंग्रेजी के बढ़ते दबदबे और हिंदी के प्रति घटते आत्मविश्वास के बीच हिंदी दिवस पर बक्सर में भाषा को लेकर गंभीर मंथन हुआ. राजकीय अनुमंडलीय पुस्तकालय में भोजपुरी साहित्य मंडल के बैनर तले आयोजित समारोह में साहित्यकारों और शिक्षाविदों ने साफ कहा कि हिंदी को मजबूत करने के लिए सिर्फ हिंदी दिवस मनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि बोलचाल, शिक्षा और सामाजिक जीवन में इसके इस्तेमाल को बढ़ाना होगा. कार्यक्रम का शुभारंभ अनुमंडल पदाधिकारी अविनाश कुमार ने मां सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण और दीप प्रज्ज्वलित कर किया.

‘हिंदी को लोक से काटेंगे तो भाषा की जड़ ही कमजोर होगी’

मुख्य अतिथि प्रसिद्ध शिक्षाविद् प्रो. रामनारायण तिवारी ने भाषा को लेकर सबसे अहम सवाल उठाया. उन्होंने कहा कि जब भाषा का संबंध लोक से खत्म होने लगता है, तभी उसकी समस्या शुरू होती है. हिंदी को लोक और शास्त्र दोनों से जुड़े रहना होगा. अंग्रेजी का वर्चस्व बढ़ रहा है, इसलिए हिंदी का अधिक से अधिक प्रयोग जरूरी है.

उन्होंने कहा कि हिंदी के प्रति समाज में मौजूद हीनभावना को सबसे पहले खत्म करना होगा. भाषा केवल किताबों और मंचों की चीज नहीं है, बल्कि उसका असली जीवन लोक के बीच है. हिंदी को जरूरत से ज्यादा कठिन और शास्त्रीय बनाने के बजाय लोकाभिमुख बनाने की दिशा में आगे बढ़ना होगा.

भोजपुरी का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि भोजपुरी में लोग पहले गाकर सीखते हैं. भाषा के प्रति लोगों में उत्साह कम होना चिंता का विषय है. शासन की नीतियां भी कई बार भाषाओं को कमजोर करती हैं.

‘हिंदी हमारी अस्मिता, भारतीयता की पहचान’

अनुमंडल पदाधिकारी अविनाश कुमार ने कहा कि हिंदी हमारी अस्मिता है. इसे आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता. उन्होंने हिंदी को वैज्ञानिक भाषा बताते हुए कहा कि इसके विकास की संभावनाएं व्यापक हैं.

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रसिद्ध साहित्यकार प्रो. डॉ. अरुण मोहन भारवि ने कहा कि हिंदी के सामने कितनी भी चुनौतियां क्यों न हों, उसे विश्वभाषा बनने से कोई रोक नहीं सकता. हिंदी भारत की आत्मा और भारतीयता की पहचान है.

महर्षि विश्वामित्र कॉलेज के प्राचार्य डॉ. कृष्ण कांत सिंह ने हिंदी को वर्तमान और भविष्य की भाषा बताया. रोटरी क्लब के अध्यक्ष निर्मल सिंह ने कहा कि जिस भाषा को हम बोलते हैं, उसी भाषा में हम जीते भी हैं. हिंदी आजादी का शंखनाद रही है और आज भी यह लोगों को जोड़ने वाली भाषा है.

प्रसिद्ध कवि कृष्ण कुमार ने कहा कि हिंदी को कोई वास्तविक चुनौती नहीं है. यह अपने स्वाभाविक विस्तार के साथ आगे बढ़ रही है और एक दिन विश्वभाषा बनने में सक्षम होगी.

वरिष्ठ पत्रकार शुभनारायण पाठक ने कहा कि लोकभाषाओं के प्रति सम्मान का भाव होना चाहिए. साथ ही हिंदी को लेकर भी सजग रहना जरूरी है. उन्होंने हिंदी को सम्मान की दृष्टि से देखने की जरूरत बताई.

सरस्वती वंदना से शुरू हुआ आयोजन, छात्राओं ने बांधा समां

कार्यक्रम की शुरुआत एसपीएस स्कूल, उनवांस की छात्राओं की सरस्वती वंदना नृत्य-नाटिका से हुई. शिक्षिका जूही केशरी के निर्देशन में कुमारी श्रेया सिंह, कुमारी नव्या सिंह और कुमारी रानी ने प्रस्तुति दी. छात्राओं की प्रस्तुति ने दर्शकों को भावविभोर कर दिया.

समारोह में मौजूद सभी विद्वान अतिथियों को भोजपुरी साहित्य मंडल की ओर से स्मृति-चिह्न और अंगवस्त्र देकर सम्मानित किया गया. मंच संचालन मंडल के महासचिव डॉ. वैरागी प्रभाष चतुर्वेदी ने किया. आयोजन को सफल बनाने में संयोजक कुशध्वज सिंह मुन्ना और प्रवीण कुमार ओझा की महत्वपूर्ण भूमिका रही.

दूसरे सत्र में कविताओं ने जगाई भाषा की संवेदना

कार्यक्रम का दूसरा सत्र कवि सम्मेलन रहा. इसमें कवियों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से हिंदी, समाज, संस्कृति और जीवन के विविध रंगों को सामने रखा. शिवबहादुर पाण्डेय ‘प्रीतम’, संजय सागर, कुशध्वज सिंह मुन्ना, फारूक सैफी, रत्नेश ओझा ‘राही’, हृदयनारायण हेहर, राजारमण पाण्डेय, कामेश्वर पाण्डेय, वशिष्ठ पाण्डेय, भगवान पाण्डेय, घुरूहू प्रजापति, वैदेही श्रीवास्तव, कृष्णमुरारी राय, राममुरारी राय, राघवेंद्र प्रकाश ‘रग्घु’, अभय तिवारी, पंकज पाण्डेय, अमरेंद्र दुबे, कौशल शर्मा, प्रवीण कुमार ओझा, कृष्ण कुमार, राजीव उपाध्याय, सोनू दुबे और विमलेश तिवारी समेत अन्य कवियों ने काव्य पाठ किया. कविताओं पर श्रोताओं की तालियों से पुस्तकालय परिसर देर तक गूंजता रहा.
















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