बक्सर में स्वास्थ्य सेवाओं पर प्रशासनिक 'ग्रहण': दो साल से अटके निजी अस्पतालों के लाइसेंस, आयुष्मान और इंश्योरेंस कार्ड बने 'रद्दी का टुकड़ा' ..

विभाग की इस लापरवाही का सीधा और घातक असर आम जनता की जेब और सेहत पर पड़ रहा है. कागजी तौर पर नवीनीकरण न होने के कारण इन अस्पतालों का संचालन एक तरह से गैर-कानूनी माना जा रहा है. इसका सबसे बड़ा नुकसान मरीजों को हो रहा है.

 



                           






- आयुष्मान कार्ड का लाभ लेने के साथ-साथ इंश्योरेंस का क्लेम लेने में भी हो रही परेशानी
- जिले में संचालित हैं तकरीबन 40 निजी अस्पताल और क्लिनिक 

बक्सर टॉप न्यूज़, बक्सर : जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था इन दिनों गंभीर प्रशासनिक सुस्ती की शिकार है. बीते दो वर्षों से जिले में संचालित निजी अस्पतालों के निबंधन (रजिस्ट्रेशन) का नवीनीकरण (रिन्यूअल) नहीं किया गया है. स्वास्थ्य विभाग की इस लापरवाही का सीधा और घातक असर आम जनता की जेब और सेहत पर पड़ रहा है. कागजी तौर पर नवीनीकरण न होने के कारण इन अस्पतालों का संचालन एक तरह से गैर-कानूनी माना जा रहा है. इसका सबसे बड़ा नुकसान मरीजों को हो रहा है, जिन्हें न तो आयुष्मान भारत योजना का लाभ मिल पा रहा है और न ही वे अपने हेल्थ इंश्योरेंस का क्लेम ले पा रहे हैं.

सूत्रों के मुताबिक, बक्सर जिले में लगभग 40 निजी अस्पताल और क्लिनिक संचालित हो रहे हैं. इनमें से मात्र दो अस्पतालों को ही आयुष्मान योजना से जोड़ा गया था. पि3छले दो सालों से स्वास्थ्य विभाग की सुस्ती का आलम यह है कि न तो पुराने अस्पतालों के लाइसेंस का नवीनीकरण किया गया और न ही आयुष्मान योजना से जोड़ने के नए आवेदनों पर कोई विचार हुआ. इस प्रशासनिक लालफीताशाही की वजह से जिले के निजी अस्पताल कानूनी अधर में लटके हुए हैं.

पड़ोसी राज्यों और जिलों के चक्कर काटने को मजबूर मरीज

स्थानीय स्तर पर बेहतर और रियायती इलाज की सुविधा न मिलने के कारण प्रतिदिन हजारों की संख्या में मरीज और उनके परिजन दूसरे शहरों का रुख करने को विवश हैं. आपातकालीन स्थिति में मरीजों को भोजपुर (आरा), रोहतास (सासाराम), कैमूर या फिर सीमावर्ती राज्य उत्तर प्रदेश के बलिया, गाजीपुर और वाराणसी जैसे शहरों में जाना पड़ रहा है.
लाखों रुपये का स्वास्थ्य बीमा और आयुष्मान कार्ड जेब में होने के बावजूद लोग अपनी गाढ़ी कमाई इलाज में गंवाने को मजबूर हैं. दूर-दराज के शहरों में जाने से न केवल मरीजों का कीमती समय बर्बाद हो रहा है, बल्कि यात्रा और महंगे इलाज के कारण उन पर आर्थिक बोझ भी दोगुना हो गया है. कई बार गंभीर स्थिति में मरीज रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं.

डॉक्टरों की चिंता: प्रशासनिक ढिलाई पर उठे सवाल

मामले की गंभीरता पर प्रकाश डालते हुए इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आइएमए) के जिला सचिव डॉ. रितेश चौबे ने स्वास्थ्य महकमे की कार्यप्रणाली पर कड़ा ऐतराज जताया है. उन्होंने कहा कि लाइसेंस रिन्यू न होने से अस्पतालों के संचालन पर कानूनी सवाल खड़े हो रहे हैं, जिससे चिकित्सा सेवा दे रहे डॉक्टरों में भी असुरक्षा का माहौल है.

डॉ. चौबे ने बताया, "अस्पतालों के लाइसेंस नवीनीकरण की प्रक्रिया को सुचारु करने के लिए हमने कई बार सिविल सर्जन और डीएम से मुलाकात कर ज्ञापन सौंपा है. हालांकि, तमाम आश्वासनों के बावजूद अब तक जिला स्तर पर कोई सार्थक पहल नहीं हो सकी है. विडंबना यह है कि बिहार के अन्य सभी जिलों में नियमानुसार निजी अस्पतालों के लाइसेंस रिन्यू किए जा रहे हैं, लेकिन बक्सर में यह प्रक्रिया पूरी तरह ठप पड़ी है."

सिविल सर्जन ने कहा पोर्टल नहीं खुलने की वजह से बनी है यह स्थिति

इस मामले में सिविल सर्जन डॉक्टर शिव कुमार प्रसाद चक्रवर्ती ने बताया कि लाइसेंस का रिन्युअल पोर्टल के माध्यम से किया जा रहा है लेकिन पोर्टल नहीं खुलने की वजह से लाइसेंस का रिन्युअल नहीं हो पा रहा है.

कब जागेगा स्वास्थ्य महकमा?

एक तरफ सरकार हर नागरिक तक सुलभ और मुफ्त इलाज पहुंचाने का दावा करती है, वहीं बक्सर में प्रशासनिक अनदेखी इन योजनाओं पर पानी फेर रही है. 

बीमा कंपनियां बिना वैध निबंधन वाले अस्पतालों में भर्ती मरीजों के क्लेम खारिज कर रही हैं. स्थानीय नागरिकों और चिकित्सा संघ ने राज्य सरकार से मांग की है कि इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप कर लाइसेंस नवीनीकरण प्रक्रिया शुरु कराई जाए, ताकि बक्सर की जनता को राहत मिल सके.











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