वीडियो : क्या बदलने वाला है भारत का चुनावी सिस्टम? बक्सर में जुटे देशभर के दिग्गज, 'वन नेशन-वन इलेक्शन' पर दिनभर चला महामंथन ..

कहा कि विकसित भारत का सपना केवल आर्थिक प्रगति से पूरा नहीं होगा, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं को पारदर्शी, जवाबदेह और तकनीक-सक्षम बनाना भी उतना ही जरूरी है. 



                             


  • आईसीएसएसआर की राष्ट्रीय संगोष्ठी में विकसित भारत-2047 के विजन पर मंथन, डिजिटल लोकतंत्र से लेकर चुनावी सुधार तक उठे कई बड़े सवाल.
  • देश के नामचीन कुलपति, शिक्षाविद और शोधार्थियों ने कहा- पारदर्शी, तकनीक-सक्षम और मजबूत चुनावी व्यवस्था ही बनेगी नए भारत की पहचान.

बक्सर टॉप न्यूज़, बक्सर : क्या भारत में भविष्य में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ होंगे? क्या डिजिटल तकनीक लोकतंत्र को और ज्यादा मजबूत बना सकती है? और क्या चुनावी व्यवस्था में बड़े बदलाव का समय आ गया है? इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने के लिए शुक्रवार को बक्सर का महर्षि विश्वामित्र महाविद्यालय राष्ट्रीय बौद्धिक विमर्श का केंद्र बन गया. भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएसएसआर), नई दिल्ली के प्रायोजन से आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के पहले दिन देशभर के कुलपति, पूर्व कुलपति, प्राध्यापक, शिक्षाविद और शोधार्थी एक मंच पर जुटे और विकसित भारत-2047 की दिशा में चुनावी सुधारों पर गंभीर मंथन किया.

कार्यक्रम की शुरुआत महर्षि विश्वामित्र की प्रतिमा पर पुष्पांजलि और दीप प्रज्ज्वलन से हुई. विद्यार्थियों के स्वागत गीत और कुलगीत ने पूरे परिसर को उत्साह और गरिमा से भर दिया. इसके बाद अतिथियों का अंगवस्त्र और स्मृति-चिह्न देकर सम्मान किया गया.

महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. कृष्णकांत सिंह ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि विकसित भारत का सपना केवल आर्थिक प्रगति से पूरा नहीं होगा, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं को पारदर्शी, जवाबदेह और तकनीक-सक्षम बनाना भी उतना ही जरूरी है. उन्होंने कहा कि "एक राष्ट्र, एक चुनाव" जैसे विषयों पर विश्वविद्यालयों में होने वाला गंभीर विमर्श भविष्य की नीतियों को दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा.

संगोष्ठी के संयोजक डॉ. अरविंद वर्मा ने कहा कि भारतीय लोकतंत्र परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है. संविधान, संघीय व्यवस्था, निर्वाचन आयोग, डिजिटल तकनीक और आम नागरिक की भागीदारी के बीच बेहतर तालमेल ही विकसित भारत की लोकतांत्रिक नींव को मजबूत करेगा. आयोजन सचिव डॉ. आलोक कुमार चतुर्वेदी ने कहा कि यह आयोजन देशभर के शिक्षाविदों और शोधार्थियों को एक ऐसा साझा मंच दे रहा है, जहां चुनावी सुधारों पर गंभीर और तथ्यपरक चर्चा हो रही है.

उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि प्रो. श्री प्रकाश मणि त्रिपाठी ने कहा कि भारत की लोकतांत्रिक परंपरा विश्व के लिए उदाहरण है और समय के साथ निर्वाचन सुधार लोकतंत्र को और अधिक प्रभावी बना सकते हैं. विशिष्ट अतिथि प्रो. तपन कुमार शांडिल्य और प्रो. सतीश कुमार राय ने संघीय व्यवस्था, संवैधानिक प्रावधानों और लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती पर अपने विचार रखे.

पहले अकादमिक सत्र में विभिन्न देशों की चुनाव प्रणालियों का तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया. वक्ताओं ने बताया कि "एक राष्ट्र, एक चुनाव" के संभावित लाभों के साथ-साथ उससे जुड़ी चुनौतियों का भी गंभीर अध्ययन जरूरी है. दूसरे सत्र में संवैधानिक संशोधन, निर्वाचन आयोग की भूमिका, संघीय ढांचे और प्रशासनिक तैयारियों पर विशेषज्ञों ने विस्तार से चर्चा की.

तकनीकी सत्रों में शोधार्थियों ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल लोकतंत्र, चुनावी पारदर्शिता, निर्वाचन सुधार और लोकतांत्रिक सुदृढ़ीकरण जैसे समकालीन विषयों पर अपने शोध-पत्र प्रस्तुत किए. विशेषज्ञों ने इन शोध-पत्रों पर विस्तृत चर्चा करते हुए शोधार्थियों को महत्वपूर्ण सुझाव भी दिए.

बिहार सहित देश के कई राज्यों से आए शिक्षाविदों और विद्यार्थियों की सक्रिय भागीदारी ने पहले दिन की संगोष्ठी को राष्ट्रीय स्तर का प्रभावशाली अकादमिक मंच बना दिया. अंत में सह-संयोजक डॉ. प्रिया रंजन ने सभी अतिथियों, प्रतिभागियों, आयोजन समिति, महाविद्यालय परिवार, आईसीएसएसआर और मीडिया प्रतिनिधियों के प्रति आभार व्यक्त किया. उन्होंने विश्वास जताया कि दूसरे दिन की चर्चा से चुनावी सुधार और डिजिटल लोकतांत्रिक सशक्तिकरण को लेकर कई महत्वपूर्ण निष्कर्ष सामने आएंगे.

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