व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है. ऐसे में यह जांच जरूरी हो जाती है कि संबंधित तस्वीर कब, कहां और किस व्यक्ति द्वारा ली गई और क्या वह वास्तव में उसी प्लॉट पर मौजूद था?

- बोरिंग का कमरा दिखा तो जमीन ‘आवासीय’, चढ़ावा मिला तो बदल गया खेल? चक्रहंसी-दुबौली में नदी किनारे की जमीन की रजिस्ट्री को लेकर गंभीर आरोप
- 85 लाख रुपये के अर्थदंड वाले पुराने मामले का भी जिक्र, अब मुख्यमंत्री और संबंधित मंत्री से शिकायत की तैयारी
बक्सर टॉप न्यूज़, बक्सर : जमीन की रजिस्ट्री में सरकारी राजस्व को चूना लगाने का कथित खेल एक बार फिर सवालों के घेरे में है. आरोप है कि जमीन की वास्तविक प्रकृति छिपाकर कभी उसे आवासीय तो कभी दूसरी प्रकृति की बताकर निबंधन कराया जा रहा है. मामला यहीं नहीं रुकता. आरोप है कि जिओ टैगिंग वाली तस्वीरों में भी ‘जुगाड़’ का रास्ता खोज लिया गया है और फोटोशॉप से लेकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई तक का इस्तेमाल किया जा रहा है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब स्थल निरीक्षण की तस्वीर ही संदिग्ध हो जाए तो जमीन की असली हकीकत आखिर सामने कैसे आएगी?
प्लॉट पर नहीं गए कर्मी, फोटो में लगा दी तस्वीर?
हाल ही में निबंधन कार्यालय परिसर में मौजूद एक फोटो स्टेट दुकान से जुड़ा मामला सामने आया था, जिसने पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए थे. आरोप है कि जिओ टैगिंग वाली तस्वीर में किसी अन्य व्यक्ति की तस्वीर जोड़ने की कोशिश की जा रही थी. बताया गया कि जिस कर्मी को जमीन की जांच के लिए प्लॉट पर जाना था, वह कथित तौर पर मौके पर नहीं गया और बाद में उसकी तस्वीर दूसरी तस्वीर में जोड़ने का प्रयास किया जा रहा था.
मामला सामने आने के बाद भी अब तक इस प्रकरण में क्या कार्रवाई हुई, इसकी स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आ सकी है. यही वजह है कि अब जिओ टैगिंग व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठने लगे हैं.
बोरिंग दिखी तो आवासीय, चढ़ावा मिला तो कृषि भूमि!
सामाजिक कार्यकर्ता सर्वेश कुमार तिवारी ने निबंधन कार्यालय की कार्यप्रणाली पर गंभीर आरोप लगाए हैं. उनका कहना है कि जमीन की प्रकृति की जांच के दौरान कई बार वास्तविक स्थिति को नजरअंदाज किया जाता है. खेतों में बोरिंग के लिए बने कमरे या किसी अन्य निर्माण को देखकर ही जमीन को आवासीय प्रकृति का बताया जाने लगता है. आरोप है कि लेन-देन होने के बाद उसी जमीन के संबंध में कार्रवाई का तरीका बदल जाता है.
सर्वेश कुमार तिवारी के मुताबिक, सदर प्रखंड के चक्रहंसी और दुबौली मौजा में नदी किनारे स्थित जमीन की प्रकृति की जांच के लिए निबंधन कार्यालय के कर्मी राकेश और आकाश पहुंचे थे. आरोप है कि कर्मियों ने जमीन को आवासीय प्रकृति का बताया, जबकि उन्हें बताया गया कि उक्त स्थल से करीब 400 मीटर तक कहीं भी कोई आवासीय प्लॉट नहीं है.
इसके बावजूद कथित तौर पर कर्मी अपनी बात पर कायम रहे. तिवारी का आरोप है कि बाद में चढ़ावा मिलने के बाद उसी जमीन की रजिस्ट्री कृषि भूमि दिखाकर कर दी गई. हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है और संबंधित कर्मियों का पक्ष भी सामने नहीं आया है.
85 लाख रुपये का अर्थदंड, फिर भी नहीं थमा कथित खेल?
भूमि की प्रकृति छिपाकर राजस्व चोरी का आरोप नया नहीं है. पांडेय पट्टी निवासी संजय कुमार तिवारी ने बताया कि वर्ष 2017 में भी भू-माफियाओं द्वारा जमीन की वास्तविक प्रकृति छिपाकर रजिस्ट्री कराने का मामला सामने आया था. इस मामले की शिकायत बिहार निबंधन महानिरीक्षक, पटना प्रमंडल से की गई थी.
संजय कुमार तिवारी के अनुसार, शिकायत के बाद संबंधित मामले में 85 लाख रुपये का अर्थदंड लगाया गया है. उनका दावा है कि जमीन की प्रकृति आवासीय थी, लेकिन उसे विकासशील भूमि के रूप में दिखाकर सरकारी राजस्व को नुकसान पहुंचाया गया.
यह मामला अब इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि आरोप लगाने वालों का कहना है कि पुराने मामले में कार्रवाई और अर्थदंड के बावजूद भूमि की प्रकृति से जुड़ा कथित खेल पूरी तरह बंद नहीं हुआ है.
![]() |
| इस तरफ होता है नकली फोटो बनाने का काम (फाइल इमेज) |
अब फोटोशॉप के साथ एआई पर भी सवाल
संजय कुमार तिवारी का आरोप है कि भूमि की प्रकृति छिपाकर राजस्व चोरी के कथित खेल में अब तकनीक का इस्तेमाल भी किया जा रहा है. उनका कहना है कि फोटोशॉप के साथ-साथ एआई तकनीक के जरिए ऐसी तस्वीरें तैयार किए जाने की आशंका है, जिनसे स्थल निरीक्षण की वास्तविकता पर सवाल खड़े हो रहे हैं.
अगर जिओ टैगिंग वाली तस्वीरों में भी छेड़छाड़ की गुंजाइश है तो फिर स्थल निरीक्षण की पूरी व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है. ऐसे में यह जांच जरूरी हो जाती है कि संबंधित तस्वीर कब, कहां और किस व्यक्ति द्वारा ली गई और क्या वह वास्तव में उसी प्लॉट पर मौजूद था?
मुख्यमंत्री और मंत्री तक जाएगा मामला
संजय कुमार तिवारी ने कहा कि वह जल्द ही पूरे मामले को लेकर संबंधित मंत्री और मुख्यमंत्री को पत्र लिखेंगे. उन्होंने जमीन की वास्तविक प्रकृति, जिओ टैगिंग वाली तस्वीरों और निबंधन की पूरी प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच कराने की मांग करने की बात कही है.
उनका कहना है कि यदि जमीन की प्रकृति बदलकर सरकारी राजस्व को नुकसान पहुंचाया जा रहा है तो इसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए और दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए.
अवर निबंधक का पक्ष नहीं हो सका प्राप्त
मामले को लेकर अवर निबंधक असित कुमार से उनका पक्ष जानने का प्रयास किया गया, लेकिन उन्होंने फोन नहीं उठाया. इस कारण उनका पक्ष ज्ञात नहीं हो सका. संबंधित अधिकारियों या कर्मियों की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आती है तो उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा.
फिलहाल इस पूरे मामले ने बक्सर के निबंधन कार्यालय की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है - अगर जमीन की तस्वीर भी ‘मैनेज’ हो सकती है और प्रकृति भी, तो सरकारी राजस्व की निगरानी आखिर किस भरोसे?





.png)










0 Comments