छोटे शहर से निकलकर दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रतिष्ठित कॉलेजों तक पहुंचीं तीनों सगी बहनें केवल उच्च शिक्षा ही नहीं ले रहीं, बल्कि देववाणी संस्कृत और भारतीय ज्ञान परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का संकल्प भी निभा रही हैं.
- एक ही परिवार की तीन बहनें दिल्ली विश्वविद्यालय के अलग-अलग कॉलेजों में कर रही हैं अध्ययन.
- संस्कृत और भारतीय ज्ञान परंपरा को आगे बढ़ाने का लिया है संकल्प
बक्सर टॉप न्यूज, बक्सर : "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता .." भारतीय संस्कृति का यह उद्घोष केवल शास्त्रों तक सीमित नहीं बल्कि अपनी जीवंतता का प्रमाण भी दे रहा है. महर्षि विश्वामित्र की तपोभूमि बक्सर की तीन बेटियां इन दिनों अपनी प्रतिभा और संस्कृत के प्रति समर्पण से नई पहचान बना रही हैं. छोटे शहर से निकलकर दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रतिष्ठित कॉलेजों तक पहुंचीं तीनों सगी बहनें केवल उच्च शिक्षा ही नहीं ले रहीं, बल्कि देववाणी संस्कृत और भारतीय ज्ञान परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का संकल्प भी निभा रही हैं. उनकी यह उपलब्धि पूरे जिले के लिए गर्व का विषय बन गई है.
भारतीय संस्कृति में गार्गी, मैत्रेयी, घोषा, लोपामुद्रा और अपाला जैसी ब्रह्मवादिनी विदुषियों की गौरवशाली परंपरा रही है. उसी परंपरा की झलक आज बक्सर की इन तीन बहनों में दिखाई देती है, जिन्होंने आधुनिक दौर में भी संस्कृत और भारतीय दर्शन को अपना जीवन लक्ष्य बनाया है.
नगर के सिविल लाइंस निवासी अधिवक्ता विनोद उपाध्याय की बड़ी पुत्री सौम्या उपाध्याय दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रतिष्ठित मिरांडा हाउस में संस्कृत स्नातक की छात्रा हैं. उन्होंने सरस्वती विद्या मंदिर, बक्सर से दसवीं की परीक्षा 93 प्रतिशत अंकों के साथ उत्तीर्ण की थी. विद्यालय से लेकर विश्वविद्यालय तक संस्कृत वाद-विवाद, भाषण और शास्त्रार्थ प्रतियोगिताओं में उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई है. उत्कृष्ट प्रदर्शन के आधार पर उन्हें दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रवृत्ति भी मिली है.
दूसरी पुत्री तनया उपाध्याय दिल्ली विश्वविद्यालय के इंद्रप्रस्थ कॉलेज में संस्कृत स्नातक की पढ़ाई कर रही हैं. उन्होंने भी सरस्वती विद्या मंदिर से 94 प्रतिशत अंकों के साथ दसवीं उत्तीर्ण की थी. उनका सपना संस्कृत के माध्यम से भारतीय ज्ञान-संस्कृति का प्रचार-प्रसार करना और प्राचीन ऋषिकाओं की परंपरा को आगे बढ़ाना है.
सबसे छोटी बहन अपूर्वा उपाध्याय लक्ष्मीबाई कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में समाज विज्ञान की छात्रा हैं. यद्यपि उनका विषय संस्कृत नहीं है, लेकिन भारतीय संस्कृति और वैदिक ज्ञान परंपरा के प्रति उनकी गहरी रुचि उन्हें अपनी बहनों के साथ इस वैचारिक यात्रा का सहभागी बनाती है.
तीनों बहनें डुमरांव अनुमंडल के एकौनी गांव निवासी स्वर्गीय अधिवक्ता सिद्धेश्वर उपाध्याय की पौत्रियां हैं. एक ही परिवार की तीन बेटियों का देश के शीर्ष विश्वविद्यालय में अध्ययनरत होना क्षेत्र के युवाओं के लिए प्रेरणा का विषय माना जा रहा है.
पिता विनोद उपाध्याय कहते हैं कि शिक्षा से बड़ी कोई संपत्ति नहीं होती. आर्थिक चुनौतियों के बावजूद उन्होंने बेटियों की पढ़ाई में कभी कमी नहीं आने दी. उनका विश्वास है कि ज्ञान ही जीवन की सबसे बड़ी पूंजी है.
माता रेखा देवी ने भी बेटियों में अनुशासन, संस्कार और अध्ययन की मजबूत नींव डाली. परिवार के अनुसार संस्कृत के प्रति तीनों बहनों की रुचि विकसित करने में उनके मामा गोविंदजी दुबे, गोपाल कृष्ण दुबे और सत्यम दुबे का महत्वपूर्ण योगदान रहा है. तीनों संस्कृत के विद्वान हैं और समय-समय पर बेटियों का मार्गदर्शन करते रहे हैं.
परिवार की इच्छा है कि तीनों बेटियां आगे चलकर संस्कृत में उच्च शोध करें, अध्यापन के क्षेत्र में जाएं और भारतीय ज्ञान परंपरा के पुनर्जागरण में अपनी भूमिका निभाएं. ऐसे समय में जब संस्कृत के गंभीर अध्ययन की ओर युवाओं का रुझान कम हो रहा है, बक्सर की ये तीन बेटियां यह संदेश दे रही हैं कि संकल्प, संस्कार और समर्पण के बल पर प्राचीन विरासत को आधुनिक युग में भी जीवंत रखा जा सकता है. उनकी यह उपलब्धि न केवल बक्सर बल्कि पूरे बिहार के लिए गर्व और प्रेरणा का विषय है.





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