नाम बदलने से पहले बक्सर की बदहाल व्यवस्था बदले : राघव कुमार पाण्डेय ..

जिस दिन बक्सर की जनता को मूलभूत सुविधाएं सहज रूप से मिलने लगेंगी, ऐतिहासिक धरोहरों का संरक्षण होगा और विश्वस्तरीय तीर्थ-पर्यटन की व्यवस्था विकसित होगी, उसी दिन बक्सर के वास्तविक पुनर्जागरण की शुरुआत मानी जाएगी.





                             



- बिजली, सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य की बदहाली पर उठाए सवाल
- बोले- विरासत का सम्मान हो, लेकिन जनता की सुविधाएं भी सर्वोच्च प्राथमिकता

बक्सर टॉप न्यूज़, बक्सर : जिले के नाम को लेकर चल रही बहस के बीच अधिवक्ता सह सामाजिक कार्यकर्ता राघव कुमार पाण्डेय ने विकास और जनसुविधाओं का मुद्दा उठाते हुए कहा है कि नाम बदलने से पहले बक्सर की व्यवस्था बदलनी चाहिए. उनका कहना है कि किसी स्थान का नाम बदलने से उसकी वास्तविक स्थिति नहीं बदलती, जब तक आम लोगों की मूलभूत समस्याओं का समाधान नहीं होता.

उन्होंने कहा कि गर्मी के दिनों में नियमित और पर्याप्त बिजली आपूर्ति आज भी बड़ी चुनौती बनी हुई है. नगर परिषद को जनता से विभिन्न प्रकार के कर नियमित रूप से मिलते हैं, लेकिन इसके अनुरूप नागरिक सुविधाएं उपलब्ध कराना अभी भी गंभीर सवाल बना हुआ है. सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता, प्रकाश और जल-निकासी जैसी व्यवस्थाओं में अपेक्षित सुधार की जरूरत है.

टैक्स जनता देती है, सुविधाएं उसका अधिकार हैं

राघव कुमार पाण्डेय ने कहा कि जिस जनता से टैक्स लिया जाता है, उसे बेहतर सड़क, स्वच्छ वातावरण, सुचारु प्रकाश व्यवस्था, स्वास्थ्य सुविधाएं और अन्य नागरिक सेवाएं मिलना उसका अधिकार है, कोई उपकार नहीं.

उन्होंने सवाल उठाया कि अगर गर्मी में जनता बिजली के लिए परेशान हो, सड़कें जर्जर हों और शिक्षा-स्वास्थ्य की मूलभूत सुविधाएं अपेक्षित स्तर की न हों, तो केवल नाम बदलने से आम नागरिक के जीवन में आखिर क्या बदलाव आएगा.

सिद्धाश्रम की पहचान पर भावनाओं का सम्मान जरूरी

राघव कुमार पाण्डेय ने कहा कि बक्सर के प्राचीन धार्मिक और सांस्कृतिक गौरव से किसी को आपत्ति नहीं हो सकती. वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड में सिद्धाश्रम का वर्णन मिलता है.

«“एष पूर्वाश्रमो राम वामनस्य महात्मनः.
सिद्धाश्रम इति ख्यातः सिद्धो ह्यत्र महातपाः..”»

उन्होंने कहा कि यदि बक्सर की ऐतिहासिक-सांस्कृतिक पहचान को लेकर समाज का एक वर्ग इसे “सिद्धाश्रम” नाम देने की मांग कर रहा है, तो उस भावना का सम्मान किया जाना चाहिए. लेकिन इसके साथ ही बक्सर की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण एवं विकास पर भी गंभीरता से काम होना चाहिए.

नाम नहीं, विरासत के अनुरूप विकास चाहिए

उन्होंने कहा कि नाम परिवर्तन के लिए जिस ऊर्जा, संसाधन और सामूहिक प्रयास की जरूरत होगी, उसी ऊर्जा को बक्सर की बिजली, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता, जल-निकासी और पर्यटन व्यवस्था सुधारने में लगाया जाए तो शहर की तस्वीर और तकदीर दोनों बदल सकती हैं.

उन्होंने प्राचीन धार्मिक स्थलों का वैज्ञानिक सर्वेक्षण, संरक्षण और सीमांकन कराने, बेहतर संपर्क मार्ग विकसित करने, श्रद्धालुओं के लिए सुविधाएं उपलब्ध कराने, शास्त्रीय स्रोतों पर आधारित सूचना केंद्र स्थापित करने तथा धार्मिक-सांस्कृतिक पर्यटन की समग्र योजना तैयार करने की जरूरत बताई.

“पहले व्यवस्था बदले, फिर तस्वीर बदले”

राघव कुमार पाण्डेय ने कहा कि बक्सर को लेकर बहस केवल नाम के समर्थन या विरोध तक सीमित नहीं रहनी चाहिए. असली सवाल यह है कि यहां रहने वाले लोगों को बेहतर जीवन और आने वाले श्रद्धालुओं को बेहतर सुविधाएं कैसे मिलें.

उन्होंने कहा, “नाम चाहे जो हो, जनता को बिजली चाहिए, अच्छी सड़क चाहिए, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा चाहिए, सुलभ स्वास्थ्य सुविधा चाहिए, स्वच्छ नगर चाहिए और अपनी ऐतिहासिक धरोहर का सम्मान चाहिए.”

उन्होंने कहा कि सिद्धाश्रम की प्रतिष्ठा केवल नाम बदलने से नहीं, बल्कि सिद्धाश्रम की गरिमा के अनुरूप व्यवस्था खड़ी करने से होगी. जिस दिन बक्सर की जनता को मूलभूत सुविधाएं सहज रूप से मिलने लगेंगी, ऐतिहासिक धरोहरों का संरक्षण होगा और विश्वस्तरीय तीर्थ-पर्यटन की व्यवस्था विकसित होगी, उसी दिन बक्सर के वास्तविक पुनर्जागरण की शुरुआत मानी जाएगी.

उन्होंने जनप्रतिनिधियों, प्रशासन और समाज से आग्रह किया कि नाम परिवर्तन की बहस के साथ-साथ बिजली, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता और पर्यटन जैसे वास्तविक जनमुद्दों को भी सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए.

उनका संदेश साफ है-

पहले व्यवस्था बदले, फिर तस्वीर बदले.
तस्वीर बदलेगी तो बक्सर की तकदीर बदलेगी.
और जब बक्सर अपनी विरासत के अनुरूप विकसित होगा,
तभी सिद्धाश्रम की महिमा वास्तविक अर्थों में दुनिया के सामने प्रतिष्ठित होगी.












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