चौसा थर्मल को मिली नई रफ्तार, अब रेल कॉरिडोर की अड़चन हटाने पर फुल फोकस ..

रेल कॉरिडोर के नए मार्ग, अधूरी चाहरदीवारी, मुरा बाबा संपर्क पथ और भूमि अधिग्रहण से प्रभावित रैयतों की समस्याओं पर विस्तार से चर्चा करते हुए संबंधित एजेंसियों को काम में तेजी लाने का निर्देश दिया गया.





                             




डीएम साहिला की हाई लेवल बैठक में लंबित कामों पर सख्ती

किसानों के मुद्दों के समाधान और निर्माण तेज करने के निर्देश

बक्सर टॉप न्यूज़, बक्सर : जिले के चौसा ताप विद्युत परियोजना को तय समय में आगे बढ़ाने की दिशा में जिला प्रशासन ने एक बार फिर मोर्चा संभाल लिया है. शुक्रवार को जिला पदाधिकारी साहिला की अध्यक्षता में हुई समीक्षा बैठक में परियोजना से जुड़े अहम मुद्दों पर मंथन हुआ. रेल कॉरिडोर के नए मार्ग, अधूरी चाहरदीवारी, मुरा बाबा संपर्क पथ और भूमि अधिग्रहण से प्रभावित रैयतों की समस्याओं पर विस्तार से चर्चा करते हुए संबंधित एजेंसियों को काम में तेजी लाने का निर्देश दिया गया.

अब नए रूट पर दौड़ेगी तैयारी

बैठक में तय किया गया कि रेल कॉरिडोर के नए प्रस्तावित मार्ग के अनुसार जल्द पिलरिंग शुरू की जाए. इसके साथ ही परियोजना की बची हुई चाहरदीवारी और मुरा बाबा संपर्क पथ का निर्माण भी प्राथमिकता के आधार पर पूरा किया जाए. प्रभावित रैयतों की समस्याओं के समाधान पर भी विशेष जोर दिया गया.

RVNL और SJVN को मिला टाइमलाइन का संदेश

जिला पदाधिकारी ने RVNL और SJVN के अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिया कि सभी लंबित कार्य आपसी समन्वय के साथ समयबद्ध तरीके से पूरे किए जाएं. प्रशासन ने संकेत दिया कि अब परियोजना की रफ्तार धीमी नहीं पड़नी चाहिए.

रेल कॉरिडोर की देरी पड़ रही भारी

बक्सर ताप विद्युत परियोजना के लिए प्रस्तावित समर्पित रेल कॉरिडोर अब तक पूरा नहीं हो सका है. नतीजतन कोयला मुख्य रेलवे लाइन और ट्रकों के जरिए बिजली घर तक पहुंचाया जा रहा है. इससे परिवहन लागत बढ़ रही है और बिजली उत्पादन महंगा पड़ रहा है.

किसानों के विरोध से बदला था पूरा प्लान

करीब 14.84 किलोमीटर लंबे रेल कॉरिडोर का मूल मार्ग भूमि अधिग्रहण विवाद में फंस गया था. किसानों के विरोध के बाद इसका रूट बदला गया, लेकिन नए मार्ग पर भी अधिग्रहण की प्रक्रिया धीमी रहने से काम अपेक्षित गति नहीं पकड़ सका.

रेल लाइन पूरी हुई तो मिलेगा बड़ा फायदा

समर्पित रेल लाइन शुरू होने के बाद कोयले की ढुलाई सीधे बिजली घर तक होगी. इससे ट्रकों पर निर्भरता खत्म होगी, परिवहन खर्च घटेगा और बिजली उत्पादन की लागत में भी कमी आएगी.

13 हजार करोड़ के पार पहुंच चुकी है परियोजना की लागत

वर्ष 2013 में शुरू हुई 1320 मेगावाट क्षमता की इस महत्वाकांक्षी परियोजना को वर्ष 2019 में 10,439.09 करोड़ रुपये की लागत से मंजूरी मिली थी. लेकिन लगातार देरी और विभिन्न बाधाओं के कारण इसकी अनुमानित लागत बढ़कर 13,756 करोड़ रुपये से अधिक हो चुकी है. फिलहाल दो 660-660 मेगावाट इकाइयों में से केवल एक इकाई से ही बिजली उत्पादन शुरू हो पाया है.

बैठक में अपर समाहर्त्ता, जिला भू-अर्जन पदाधिकारी, RVNL तथा SJVN के अधिकारी उपस्थित रहे.













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