शिकायत मिलने के बाद जिला पदाधिकारी के निर्देश पर 20 जून 2022 को अवर निबंधक कार्यालय ने इस भूमि को कंप्यूटर की रोक सूची में दर्ज कर दिया था, ताकि उसकी रजिस्ट्री नहीं हो सके.
- डीएम के आदेश पर कंप्यूटर की रोक सूची में दर्ज थी विवादित जमीन, फिर भी हो गई रजिस्ट्री का दावा
- फर्जी न्यायालयी आदेश के सहारे रजिस्ट्री कराने की शिकायत पर सब रजिस्ट्रार समेत अन्य के खिलाफ पहले ही दर्ज हो चुकी है प्राथमिकी
बक्सर टॉप न्यूज़, बक्सर : निबंधन कार्यालय एक बार फिर गंभीर आरोपों के घेरे में है. इस बार मामला ऐसी जमीन की रजिस्ट्री से जुड़ा है जिस पर न्यायालय ने वर्षों पहले यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था और जिला प्रशासन ने भी उसकी खरीद-बिक्री पर रोक लगाते हुए उसे निबंधन कार्यालय की कंप्यूटर आधारित रोक सूची में दर्ज कराया था. इसके बावजूद उसी जमीन की रजिस्ट्री होने का आरोप सामने आने से पूरे तंत्र पर सवाल उठ खड़े हुए हैं.
मामले में नया बाजार वार्ड संख्या-3 निवासी अधिवक्ता रमेश चन्द्र ने नगर थाना में भू माफियाओं तथा तत्कालीन सब रजिस्ट्रार असित कुमार सिंह समेत अन्य के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई थी. शिकायतकर्ता का आरोप है कि न्यायालय के फर्जी आदेश का सहारा लेकर विवादित जमीन की रजिस्ट्री कर दी गई.
2006 से न्यायालय के आदेश के बावजूद बना रहा विवाद
शिकायत के अनुसार मामला पांडेय पट्टी की खाता संख्या-145 तथा प्लॉट संख्या-1014 और 1015 की जमीन से जुड़ा है. यह भूमि रमेश चन्द्र की पत्नी संध्या कुमारी के नाम दर्ज है. इस भूमि को लेकर वर्ष 2000 से न्यायालय में मुकदमा लंबित है. शिकायतकर्ता के अनुसार 1 नवंबर 2006 को न्यायालय ने दोनों पक्षों को यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था, जिससे विवादित भूमि की स्थिति में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं किया जा सकता था.
डीएम के आदेश के बाद भी नहीं रुकी रजिस्ट्री
बताया गया कि विवादित जमीन की खरीद-बिक्री की शिकायत मिलने के बाद जिला पदाधिकारी के निर्देश पर 20 जून 2022 को अवर निबंधक कार्यालय ने इस भूमि को कंप्यूटर की रोक सूची में दर्ज कर दिया था, ताकि उसकी रजिस्ट्री नहीं हो सके. आरोप है कि इसके बावजूद नियमों की अनदेखी कर जमीन का निबंधन कर दिया गया.
फर्जी न्यायालयी पत्र के सहारे रजिस्ट्री का आरोप
रमेश चन्द्र का आरोप है कि 4 फरवरी 2025 की तारीख का न्यायालय का एक फर्जी पत्र तैयार किया गया, जिस पर नकली मुहर और कथित रूप से न्यायाधीश के फर्जी हस्ताक्षर लगाए गए. इसी दस्तावेज को आधार बनाकर तत्कालीन सब रजिस्ट्रार की मिलीभगत से जमीन की रजिस्ट्री करा दी गई. इस पूरे मामले को लेकर नगर थाना में प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी.
एक और विवादित जमीन की खरीद-बिक्री पर उठे सवाल
इसी बीच पांडेय पट्टी का एक और मामला भी चर्चा में है. सामाजिक कार्यकर्ता सर्वेश कुमार तिवारी का कहना है कि मनोरंजन चतुर्वेदी और कामेश्वर चौधरी के बीच लंबे समय से चल रहे भूमि विवाद में भी न्यायालय का निषेधाज्ञा आदेश प्रभावी है. इसके बावजूद उस जमीन की खरीद-बिक्री होने की बात सामने आ रही है. हालांकि इस मामले में किसी प्रकार के फर्जीवाड़े की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हो सकी है.
'नोटिस' के नाम पर फाइलों में चलता है खेल?
भूमि मामलों से जुड़े एक जानकार ने नाम प्रकाशित नहीं करने की शर्त पर दावा किया कि न्यायालय से रोक वाले मामलों में रजिस्ट्री कराने के लिए एक विशेष तरीका अपनाया जाता है. उनके अनुसार निबंधन कार्यालय से आपत्ति संबंधी नोटिस जारी कर उसे फाइलों में ही दबा दिया जाता है. यदि निर्धारित अवधि में कोई जवाब दर्ज नहीं होता तो बाद में उसी आधार पर रजिस्ट्री की प्रक्रिया पूरी कर दी जाती है. हालांकि इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है.
डीएम का पक्ष नहीं आ सका सामने
इस पूरे मामले में जिला पदाधिकारी साहिला का पक्ष जानने के लिए उनसे दूरभाष पर संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन संपर्क नहीं हो सका. ऐसे में उनका पक्ष प्राप्त नहीं हो पाया.
अब प्रशासनिक कार्रवाई पर टिकी हैं निगाहें
रजिस्ट्री कार्यालय से जुड़े लगातार सामने आ रहे मामलों ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि यदि न्यायालय के आदेश, जिला प्रशासन की रोक और कंप्यूटर की ब्लॉक सूची के बावजूद विवादित जमीनों की रजिस्ट्री हो रही है, तो आखिर इस पूरे खेल के पीछे जिम्मेदार कौन है. अब लोगों की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि प्रशासन इस मामले में क्या कार्रवाई करता है और दोषियों के खिलाफ कब तक सख्त कदम उठाए जाते हैं.






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