कहा कि दस से पंद्रह दिन में कभी-कभार कोई कर्मचारी आता है और फिर केंद्र बंद हो जाता है. बरसात के मौसम में सांप काटने जैसी घटनाएं आम होती हैं, लेकिन इस उपकेंद्र में प्राथमिक उपचार तक की व्यवस्था नहीं है.
- पांडेय पट्टी स्वास्थ्य उपकेंद्र की पड़ताल में खुली बदइंतजामी की परतें
- गंदगी, जलजमाव, लटकते बिजली के तार और बंद दरवाजे ने खड़े किए कई सवाल
बक्सर टॉप न्यूज़, बक्सर : सरकार गांव और शहर के अंतिम व्यक्ति तक बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने का दावा करती है. करोड़ों रुपये खर्च कर स्वास्थ्य उपकेंद्र बनाए जाते हैं, ताकि छोटी बीमारी के लिए लोगों को दूर न जाना पड़े, लेकिन नगर के पांडेय पट्टी स्थित स्वास्थ्य उपकेंद्र की तस्वीर इन दावों की हकीकत बयां करती है. यहां पहुंचते ही सबसे पहले मरीज का सामना डॉक्टर से नहीं, बल्कि गोबर, कीचड़, जलजमाव और बंद दरवाजे से होता है. परिसर में फैली गंदगी, टूटी व्यवस्था और लटका ताला यह सवाल खड़ा करता है कि आखिर यह उपकेंद्र मरीजों के लिए बना है या केवल सरकारी अभिलेखों की शोभा बढ़ाने के लिए.
उपकेंद्र तक पहुंचने वाला रास्ता पूरी तरह कीचड़ और पानी में डूबा मिला. परिसर के चारों ओर गोबर फैला हुआ है. जलजमाव में मरे हुए जीव पड़े हैं, जिनसे उठती दुर्गंध और मच्छरों का झुंड पूरे इलाके में बीमारी फैलने का खतरा पैदा कर रहा है. विडंबना यह है कि जहां लोगों को बीमारियों से बचाने की जिम्मेदारी होनी चाहिए, वहीं का वातावरण खुद संक्रमण को न्योता देता नजर आता है. परिसर में बिजली का एक तार भी टूटकर लटक रहा है. स्थानीय लोगों का कहना है कि बरसात के दिनों में यह किसी भी समय जानलेवा हादसे का कारण बन सकता है.
शाम चार बजे भी लटका मिला ताला
पड़ताल के दौरान शाम करीब चार बजे स्वास्थ्य उपकेंद्र के मुख्य दरवाजे पर ताला लटका मिला. आसपास मौजूद लोगों ने बताया कि यह कोई नई बात नहीं है. पूर्व पार्षद प्रेम शंकर सिंह का कहना है कि केंद्र कई-कई दिनों तक बंद रहता है.
कभी खुल भी जाए तो यह तय नहीं होता कि डॉक्टर मिलेंगे, दवा मिलेगी या केवल औपचारिकता पूरी कर कर्मचारियों के लौट जाने के बाद फिर ताला लटक जाएगा. उनका कहना है कि सरकारी स्वास्थ्य सेवा नहीं मिलने के कारण गरीब परिवारों को मजबूरी में निजी अस्पतालों में महंगा इलाज कराना पड़ता है.
स्थानीय जनप्रतिनिधि ने उठाए गंभीर सवाल
नगर परिषद के उप चेयरमैन प्रतिनिधि सुनील कुमार मिश्रा ने भी व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि दस से पंद्रह दिन में कभी-कभार कोई कर्मचारी आता है और फिर केंद्र बंद हो जाता है. बरसात के मौसम में सांप काटने जैसी घटनाएं आम होती हैं, लेकिन इस उपकेंद्र में प्राथमिक उपचार तक की व्यवस्था नहीं है. उन्होंने आरोप लगाया कि कई बार संबंधित अधिकारियों को शिकायत करने के बावजूद हालात नहीं बदले. उनका कहना था कि ऐसा लगता है जैसे इस इलाके के लोगों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया है.
इलाज की उम्मीद में आते हैं, लौटते हैं मायूस
स्थानीय निवासी संतोष कुमार ने बताया कि आसपास के मोहल्लों और गांवों से महिलाएं, बुजुर्ग और बच्चे पानी पार कर यहां इलाज की उम्मीद में पहुंचते हैं, लेकिन अधिकतर समय उन्हें बंद दरवाजा ही मिलता है. उन्होंने आरोप लगाया कि सप्ताह में कभी-कभार कोई कर्मचारी आकर दवाओं का डिब्बा रख देता है और लौट जाता है. नियमित चिकित्सकीय सेवा की उम्मीद करना यहां के लोगों के लिए अब लगभग बेकार हो चुका है. खराब रास्ते के कारण गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और गंभीर मरीजों की परेशानी कई गुना बढ़ जाती है.
आंगनबाड़ी और मतदान केंद्र के आसपास भी गंदगी
चौंकाने वाली बात यह भी है कि स्वास्थ्य उपकेंद्र के ठीक बगल में आंगनबाड़ी केंद्र और मतदान केंद्र संचालित होता है। इन परिसरों के आसपास भी गंदगी का अंबार लगा है. खाली शराब और बीयर की बोतलें खुलेआम पड़ी मिलीं. ऐसे माहौल में बच्चों और महिलाओं का आना-जाना स्थानीय लोगों की चिंता बढ़ा रहा है. लोगों का कहना है कि यदि सरकारी परिसरों की यह स्थिति है तो आम नागरिकों को स्वच्छता का संदेश कैसे दिया जाएगा.
जिम्मेदार अधिकारी को भी नहीं स्पष्ट जानकारी
स्थानीय लोगों के अनुसार, इस मामले में सिविल सर्जन से संपर्क करने पर उन्होंने स्वास्थ्य उपकेंद्र के नियमित संचालन की स्पष्ट जानकारी नहीं होने की बात कही और मामले की जांच कराने का आश्वासन दिया. हालांकि बड़ा सवाल यह है कि यदि जिले के जिम्मेदार अधिकारी को ही यह जानकारी नहीं है कि उपकेंद्र कब खुलता है और वहां स्वास्थ्य सेवाएं मिल रही हैं या नहीं, तो फिर इसकी निगरानी कौन कर रहा है.
सबसे बड़ा सवाल
जिस स्वास्थ्य उपकेंद्र पर लोगों की पहली उम्मीद टिकी हो, अगर वहां ताला, गंदगी और बदइंतजामी ही मिले, तो सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर भरोसा कैसे कायम रहेगा? अब निगाहें इस बात पर हैं कि जिम्मेदार अधिकारी केवल आश्वासन देंगे या पांडेय पट्टी के लोगों को वास्तव में इलाज का अधिकार भी मिलेगा.





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