‘वक्षः शरयति’ से बक्सर नाम की व्याख्या पर उठे सवाल, पाणिनीय व्याकरण के आधार पर खंडन ..

‘वक्षः शरयति’ जैसी व्याख्याओं पर सिद्धाश्रम के पं. विनय चतुर्वेदी ने गंभीर आपत्ति जताई है. उन्होंने पाणिनीय व्याकरण और संस्कृत भाषाशास्त्र का हवाला देते हुए कहा कि ‘वक्षः शरयति’ से बक्सर शब्द की व्युत्पत्ति सिद्ध नहीं होती और इसे बक्सर के नामकरण से जोड़ना भाषाशास्त्रीय दृष्टि से उचित नहीं है.






                             


  • पं. विनय चतुर्वेदी बोले- बक्सर जैसे पावन स्थल के नाम को काल्पनिक व्याख्याओं से जोड़ना शास्त्रीय दृष्टि से अनुचित
  • ‘व्याघ्रसरः’ को बताया बक्सर का प्रामाणिक प्राचीन नाम, प्राकृत और भोजपुरी के ध्वनि परिवर्तन से ‘बगसर’ और फिर ‘बक्सर’ बनने का दावा

बक्सर टॉप न्यूज़, बक्सर : बक्सर के नामकरण को लेकर सामने आ रही ‘वक्षः शरयति’ जैसी व्याख्याओं पर सिद्धाश्रम के पं. विनय चतुर्वेदी ने गंभीर आपत्ति जताई है. उन्होंने पाणिनीय व्याकरण और संस्कृत भाषाशास्त्र का हवाला देते हुए कहा कि ‘वक्षः शरयति’ से बक्सर शब्द की व्युत्पत्ति सिद्ध नहीं होती और इसे बक्सर के नामकरण से जोड़ना भाषाशास्त्रीय दृष्टि से उचित नहीं है.

पं. विनय चतुर्वेदी के अनुसार हाल के दिनों में बक्सर नाम की व्याख्या के लिए पहले ‘वक्षः शरति’ और बाद में ‘वक्षः शरयति’ जैसे पदों का इस्तेमाल किया जा रहा है. उनका कहना है कि इन शब्दों को संस्कृत व्याकरण की कसौटी पर परखने पर यह व्याख्या टिकती नहीं है.

‘शरयति’ के अर्थ पर उठाया सवाल

उन्होंने बताया कि संस्कृत व्याकरण में ‘शरयति’ रूप को ‘शॄ’ धातु से जोड़कर देखा जाता है. इस धातु का संबंध हिंसा अथवा विदारण के अर्थ से बताया गया है. णिच् प्रत्यय के प्रयोग से बने ‘शरयति’ का अर्थ हिंसा करवाना, विदारित करना या नष्ट करना जैसे अर्थों में लिया जाता है.

ऐसे में ‘वक्षः’ यानी छाती या हृदय के साथ ‘शरयति’ को जोड़ने पर जो अर्थ निकलता है, वह किसी पवित्र तपोभूमि के नामकरण की सकारात्मक व्याख्या के अनुरूप नहीं बैठता. पं. चतुर्वेदी ने कहा कि महर्षि विश्वामित्र की तपोभूमि, भगवान श्रीराम की कर्मभूमि और ऋषियों की सिद्धि-स्थली के रूप में प्रतिष्ठित बक्सर के नाम को हिंसा अथवा विदारण जैसे अर्थों से जोड़ना उचित नहीं है.

संधि नियमों से भी ‘बक्सर’ की व्युत्पत्ति नहीं

पं. विनय चतुर्वेदी ने पाणिनीय अष्टाध्यायी के विसर्ग संधि संबंधी नियमों का उल्लेख करते हुए कहा कि ‘वक्षः’ और ‘शरयति’ को जोड़ने पर भी ऐसा कोई व्याकरणिक रूप सामने नहीं आता, जिससे ‘बक्सर’ शब्द की निष्पत्ति सिद्ध की जा सके. उनके मुताबिक ‘वक्षःशरयति’ अथवा संधि के नियमानुसार बनने वाले रूप को ध्वनि परिवर्तन के माध्यम से सीधे ‘बक्सर’ मान लेना शास्त्रीय रूप से स्वीकार्य नहीं है.

‘व्याघ्रसरः’ को बताया प्राचीन नाम

बक्सर के नामकरण के संबंध में पं. चतुर्वेदी ने ‘व्याघ्रसरः’ को प्रामाणिक प्राचीन नाम बताया. उनके अनुसार ‘व्याघ्र’ और ‘सरः’ से बने ‘व्याघ्रसरः’ का अर्थ बाघों का पावन सरोवर माना जाता है. उनका दावा है कि कालांतर में प्राकृत और भोजपुरी के ध्वनि परिवर्तन के चलते इसका रूप ‘बगसर’ और फिर आधुनिक हिंदी में ‘बक्सर’ के रूप में विकसित हुआ.

अभिलेख और ऐतिहासिक ग्रंथों का दिया हवाला

उन्होंने कहा कि बक्सर के प्राचीन नाम के समर्थन में संवत 1451 यानी 1394 ईस्वी के उज्जयिनिया अभिलेखों और मुगलकालीन ग्रंथ ‘आइन-ए-अकबरी’ का भी उल्लेख मिलता है. उनके अनुसार इन ऐतिहासिक संदर्भों को ध्यान में रखते हुए बक्सर के नामकरण की व्याख्या करनी चाहिए, न कि केवल ध्वनि-साम्य के आधार पर किसी नए शब्द की व्युत्पत्ति गढ़नी चाहिए.

‘बक्सर की आत्मा सिद्धाश्रम है’

पं. विनय चतुर्वेदी ने कहा कि बक्सर की पहचान केवल एक आधुनिक शहर के रूप में नहीं, बल्कि प्राचीन सिद्धाश्रम और ऋषि परंपरा से जुड़े क्षेत्र के रूप में है. उन्होंने कहा कि संस्कृत भाषाशास्त्र और पाणिनीय व्याकरण के सिद्धांतों को अपनी सुविधा के अनुसार मोड़कर काल्पनिक व्युत्पत्तियां प्रस्तुत करने के बजाय बक्सर के ऐतिहासिक और शास्त्रीय संदर्भों का अध्ययन किया जाना चाहिए.

उन्होंने जोर देकर कहा कि बक्सर की वास्तविक पहचान ‘सिद्धाश्रम’ से जुड़ी है और इसके प्राचीन नाम ‘व्याघ्रसरः’ की परंपरा को शास्त्रीय एवं ऐतिहासिक संदर्भों के साथ समझे जाने की आवश्यकता है













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