बक्सर की गलियों से दिल्ली के बड़े साहित्यिक मंच तक पहुंची रोहित की आवाज ..

कहा कि साहित्य सिर्फ किताब लिखने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज से संवाद करने और सकारात्मक बदलाव की शुरुआत करने का जरिया है. दिल्ली के इस प्रतिष्ठित मंच पर विचार साझा करना उनके लिए लेखन और वक्तृत्व की यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव रहा.

श्रोताओं को संबोधित करते रोहित दुबे






                             



- IIC के सी.डी. देशमुख ऑडिटोरियम में लेखक-वक्ता के रूप में हुए शामिल 
- युवाओं को बताया- किताबों से बाहर भी जिंदगी के कई जरूरी सबक

बक्सर टॉप न्यूज़, बक्सर : नगर : के श्रीकृष्ण नगर से निकली एक आवाज ने दिल्ली के प्रतिष्ठित साहित्यिक मंच पर अपनी जगह बनाई. श्रीकृष्ण नगर निवासी और स्वर्गीय डॉ. बैजनाथ दुबे के पुत्र रोहित दुबे ने नई दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के सी.डी. देशमुख ऑडिटोरियम में आयोजित वार्षिक साहित्यिक सम्मेलन में लेखक एवं वक्ता के रूप में सहभागिता की. राष्ट्रीय स्तर के इस मंच पर उन्होंने जीवन-मूल्यों, युवाओं की चुनौतियों, व्यक्तित्व विकास और जिंदगी से मिलने वाले उन जरूरी सबक पर अपने विचार रखे, जो अक्सर स्कूल की किताबों में नहीं मिलते.

बक्सर से दिल्ली तक पहुंची साहित्य की गूंज

इंडिया इंटरनेशनल सेंटर देश के प्रमुख सांस्कृतिक और बौद्धिक संस्थानों में गिना जाता है. यहां साहित्य, कला, संस्कृति और समसामयिक विषयों पर देश-विदेश के लेखक, बुद्धिजीवी और अलग-अलग क्षेत्रों की नामचीन हस्तियां संवाद करती हैं. इसी मंच पर बक्सर के रोहित दुबे की मौजूदगी ने जिले की साहित्यिक पहचान को नई चर्चा दी.

रोहित ने अपने विचारों में खास तौर पर युवाओं और उनके भविष्य को केंद्र में रखा. उनका कहना था कि शिक्षा केवल परीक्षा पास करने या डिग्री हासिल करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए. असली जिंदगी में संवाद कैसे करें, फैसले कैसे लें, असफलताओं से कैसे सीखें और खुद पर भरोसा कैसे बनाए रखें, ये भी उतने ही जरूरी सबक हैं.

किताबों में दर्ज हैं जिंदगी के 'अनकहे पाठ'

रोहित दुबे की पुस्तक 30 Lessons Not Taught in School और Letter To My Son भी इसी सोच को आगे बढ़ाती हैं. उनकी किताबों में उन जीवन-पाठों को जगह दी गई है, जिनकी जरूरत हर युवा को अपने व्यक्तिगत और व्यावसायिक जीवन में पड़ती है.

लेखन के साथ रोहित युवाओं के लिए जीवन-कौशल, संचार कौशल, करियर मार्गदर्शन, व्यक्तित्व विकास और सार्वजनिक वक्तृत्व जैसे क्षेत्रों में भी काम कर रहे हैं. उनका प्रयास है कि युवा सिर्फ नौकरी पाने की तैयारी न करें, बल्कि जिंदगी को समझने और चुनौतियों से लड़ने की क्षमता भी विकसित करें.

छोटे शहर के युवाओं के लिए बड़ा संदेश

राष्ट्रीय मंच पर पहुंचने की अपनी यात्रा को रोहित छोटे शहरों के युवाओं से भी जोड़ते हैं. उनका मानना है कि मंजिल के लिए शहर बड़ा होना जरूरी नहीं, सोच बड़ी होना जरूरी है. निरंतर सीखने और प्रयास करते रहने की आदत इंसान को छोटे शहर से बड़े मंच तक पहुंचा सकती है.

उन्होंने कहा कि साहित्य सिर्फ किताब लिखने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज से संवाद करने और सकारात्मक बदलाव की शुरुआत करने का जरिया है. दिल्ली के इस प्रतिष्ठित मंच पर विचार साझा करना उनके लिए लेखन और वक्तृत्व की यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव रहा.

बक्सर से दिल्ली तक रोहित दुबे की यह यात्रा उन युवाओं के लिए उम्मीद और प्रेरणा की कहानी भी है, जो अपने छोटे शहर से निकलकर देश के बड़े मंचों पर अपनी पहचान बनाने का सपना देखते हैं.












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