जहां गुरु का सम्मान, वहीं ज्ञान का उजाला... डुमरांव में सजा महर्षि विश्वामित्र सम्मान का मंच ..

कहा कि ऐसे आयोजनों का उद्देश्य शिक्षकों, विद्यार्थियों और समाज के विभिन्न वर्गों को एक मंच पर लाकर शिक्षा, संस्कृति और संस्कार को लेकर सकारात्मक संवाद को बढ़ावा देना है.






                             


- बिहार के 16 जिलों समेत तीन राज्यों के शिक्षक-शिक्षाविद हुए शामिल, शिक्षा के साथ संस्कार और संस्कृति पर हुई गहरी चर्चा

- छात्राओं की सरस्वती वंदना और सावन की कजरी ने मोहा मन. ई-मैग्जीन के विमोचन के साथ गुरु-शिष्य परंपरा का संदेश

बक्सर टॉप न्यूज़, बक्सर : गुरु केवल ज्ञान देने वाला नहीं, बल्कि पीढ़ियों को सही दिशा दिखाने वाला मार्गदर्शक होता है. इसी भावना के साथ रविवार को डुमरांव में राज्य स्तरीय सेमिनार सह महर्षि विश्वामित्र गुरु सम्मान-2026 का आयोजन किया गया. विकास फैमिली क्लब परिवार और एक्टिव टीचर्स एंड स्टुडेंट फेसबुक ग्रुप के संयुक्त तत्वावधान में हुए आयोजन में बिहार के 16 जिलों के साथ छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश से शिक्षक, शिक्षाविद और सामाजिक क्षेत्र से जुड़े लोग पहुंचे. शिक्षा, संस्कृति और संस्कार के संरक्षण के साथ गुरु-शिष्य परंपरा को मजबूत करने पर सार्थक चर्चा हुई.

कार्यक्रम का उद्घाटन महाराजा बहादुर मान विजय सिंह, डुमरांव विधायक राहुल कुमार सिंह, डायट डुमरांव के व्याख्याता नवनीत सिंह और सुमित्रा महिला कॉलेज डुमरांव की प्राचार्या डॉ. शोभा सिंह समेत अन्य अतिथियों ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलित कर किया. दीप प्रज्वलन के साथ ही आयोजन स्थल ज्ञान, सम्मान और संस्कार के संदेश से सराबोर हो उठा.

मानविजय सिंह के साथ अनुपमा प्रसाद 

सरस्वती वंदना से हुई शुरुआत, कजरी ने बांधा समां

मध्य विद्यालय पुराना भोजपुर की छात्राओं ने सरस्वती वंदना की मनमोहक प्रस्तुति देकर कार्यक्रम को भक्तिमय बना दिया. इसके बाद सावन माह के अवसर पर छात्रा की कजरी गीत प्रस्तुति ने लोगों का मन मोह लिया. शिक्षा और गुरु सम्मान के बीच लोक संस्कृति की इस खूबसूरत झलक की अतिथियों और दर्शकों ने जमकर सराहना की.

16 जिलों से पहुंचे शिक्षक, तीन राज्यों की भी भागीदारी

सेमिनार में किशनगंज, समस्तीपुर, पूर्वी चंपारण, गया, जमुई, भागलपुर, मुजफ्फरपुर, भोजपुर, बक्सर, नालंदा, मधुबनी और दरभंगा समेत बिहार के विभिन्न जिलों से शिक्षक एवं शिक्षाविद पहुंचे. वहीं छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश से भी प्रतिभागियों ने कार्यक्रम में हिस्सा लिया. अलग-अलग क्षेत्रों से पहुंचे शिक्षकों ने शिक्षा की मौजूदा चुनौतियों और विद्यार्थियों के विकास से जुड़े विषयों पर विचार साझा किए.

शिक्षा के साथ संस्कार की पाठशाला पर भी जोर

कार्यक्रम में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि बदलते समय के साथ शिक्षा का स्वरूप भले बदल रहा हो, लेकिन संस्कार और संस्कृति की जड़ें मजबूत रहनी चाहिए. वक्ताओं ने कहा कि विद्यार्थियों को केवल किताबी ज्ञान देना पर्याप्त नहीं है. उन्हें भारतीय संस्कृति, सामाजिक जिम्मेदारी और मानवीय मूल्यों से जोड़ना भी शिक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा है.

ई-मैग्जीन में दिखेगा शिक्षकों और विद्यार्थियों का हुनर

आयोजन के दौरान एक्टिव टीचर्स एंड स्टुडेंट ई-मैग्जीन का विमोचन भी किया गया. ई-मैग्जीन में शिक्षा, शिक्षक, विद्यार्थी, सामाजिक सरोकार और रचनात्मक गतिविधियों से जुड़ी सामग्री को प्रमुखता दी गई है. आयोजकों ने कहा कि यह मंच शिक्षकों और विद्यार्थियों की रचनात्मक प्रतिभा को सामने लाने और उनके विचारों को व्यापक मंच देने की दिशा में अहम पहल है.

गुरु-शिष्य परंपरा को नई पीढ़ी से जोड़ने का संदेश

सेमिनार में भारतीय संस्कृति और गुरु-शिष्य परंपरा के महत्व को प्रमुखता से रेखांकित किया गया. आयोजकों ने कहा कि गुरु का सम्मान केवल एक दिन या एक आयोजन तक सीमित नहीं होना चाहिए. गुरु के प्रति सम्मान, अनुशासन और ज्ञान के प्रति समर्पण जैसी परंपराएं नई पीढ़ी तक पहुंचाना समाज की जिम्मेदारी है.

आयोजन को सफल बनाने में इनकी रही भूमिका

कार्यक्रम की अध्यक्षता पत्रकार सह संस्थापक विकास फैमिली क्लब परिवार एवं एक्टिव टीचर्स एंड स्टुडेंट फेसबुक ग्रुप मनोज कुमार मिश्रा ने की. मंच संचालन सीके पांडेय एवं डॉ. संजय कुमार सिंह ने किया. आयोजन को सफल बनाने में तबरेज़ आलम, राजेश वर्मा, धीरज मिश्रा, राजेश मिश्रा, अनुज कुमार मिश्रा, आकाश मिश्र, मनीष मिश्रा, सुचित्रा दास, अनिता यादव, सविता सिंह, संतोषी डनसेना समेत आयोजन मंडल के सदस्यों की महत्वपूर्ण भूमिका रही.

मकसद साफ, शिक्षा के साथ संस्कार को भी मिले मजबूती

आयोजकों ने कहा कि ऐसे आयोजनों का उद्देश्य शिक्षकों, विद्यार्थियों और समाज के विभिन्न वर्गों को एक मंच पर लाकर शिक्षा, संस्कृति और संस्कार को लेकर सकारात्मक संवाद को बढ़ावा देना है. महर्षि विश्वामित्र गुरु सम्मान के माध्यम से गुरुजनों के योगदान को सम्मान देने के साथ समाज में गुरु-शिष्य संबंधों और भारतीय ज्ञान परंपरा के महत्व को भी मजबूती देने का प्रयास किया गया.













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