वीडियो : जिउतिया की तारीख पर बक्सर में छिड़ा शास्त्रीय विवाद, 3 नहीं 4 अक्टूबर को व्रत रखने का दावा ..

3 और 4 अक्टूबर की तारीख के बीच चल रही यह बहस धार्मिक आस्था के साथ-साथ पंचांग गणना और शास्त्रीय नियमों पर भी केंद्रित हो गई है. ऐसे में व्रत रखने वाली महिलाएं स्थानीय विद्वानों के मत के आधार पर तिथि का निर्णय लेने की सलाह दी जा रही है.


 





                           



  • सप्तमी-विद्ध अष्टमी को व्रत से बचने की सलाह, सेवानिवृत्त प्राध्यापक डॉ. नारायण उपाध्याय ने शास्त्रीय प्रमाणों का दिया हवाला
  • काशी के पंचांगों में तिथि निर्धारण को लेकर भी उठे सवाल, बक्सर के विद्वान पंचांग निर्माताओं से कर रहे संपर्क 

बक्सर टॉप न्यूज़, बक्सर : जिले में इस बार जीवित्पुत्रिका यानी जिउतिया व्रत की तारीख को लेकर असमंजस की स्थिति बन गई है. कुछ पंचांगों में जहां 3 अक्टूबर को जिउतिया व्रत की तिथि बताई जा रही है, वहीं बक्सर के स्थानीय विद्वान शास्त्रीय प्रमाणों के आधार पर 4 अक्टूबर को व्रत रखने की बात कह रहे हैं. इस तिथि विवाद ने व्रत रखने वाली महिलाओं के बीच भी संशय पैदा कर दिया है.

श्रीवास मुकुंद रामानुज संस्कृत महाविद्यालय के सेवानिवृत्त प्राध्यापक डॉ. नारायण उपाध्याय ने जिउतिया की तिथि को लेकर अपना पक्ष रखते हुए कहा कि जीवित्पुत्रिका व्रत के लिए सप्तमी-विद्ध अष्टमी का पूरी तरह त्याग किया जाना चाहिए. उनके अनुसार, जिस अष्टमी तिथि में सप्तमी का स्पर्श हो, उस दिन जीवित्पुत्रिका व्रत नहीं रखा जाना चाहिए.

सप्तमी का स्पर्श वाली अष्टमी क्यों मानी गई वर्जित?

डॉ. उपाध्याय के मुताबिक शास्त्रों में जीवित्पुत्रिका व्रत के लिए तिथि निर्धारण को लेकर स्पष्ट नियम दिए गए हैं. सप्तमी-विद्ध अष्टमी में व्रत रखने को उन्होंने शास्त्रसम्मत नहीं बताया. उनका कहना है कि ऐसी तिथि में व्रत रखने से विघ्न और संतान के लिए अनिष्ट की आशंका बताई गई है.

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि व्रत के पारण को लेकर नवमी अथवा दशमी तिथि में कोई विशेष निषेध नहीं है. मुख्य सवाल यह है कि व्रत किस अष्टमी तिथि में रखा जा रहा है और उस तिथि पर सप्तमी का स्पर्श है या नहीं.

पंचांगों में अलग-अलग तारीख से बढ़ा भ्रम

डॉ. उपाध्याय ने पंचांगों में तिथि निर्धारण को लेकर भी सवाल उठाए. उनका कहना है कि पिछले कुछ वर्षों से काशी से प्रकाशित कुछ पंचांगों में मैथिल निबंधों के प्रभाव के कारण तिथियों के निर्णय में अंतर देखने को मिल रहा है. ऐसे में किसी तारीख को अंतिम मानने से पहले उसके पीछे दिए गए शास्त्रीय प्रमाणों की जांच जरूरी है.

उन्होंने कहा कि बक्सर के विद्वान अब इस मामले को लेकर काशी और अन्य स्थानों के पंचांग निर्माताओं से संपर्क कर रहे हैं, ताकि तिथि को लेकर उत्पन्न भ्रम को दूर किया जा सके और भविष्य में व्रत-त्योहारों की तारीख को लेकर लोगों के बीच असमंजस की स्थिति नहीं बने.

फिलहाल जिउतिया व्रत को लेकर 3 और 4 अक्टूबर की तारीख के बीच चल रही यह बहस धार्मिक आस्था के साथ-साथ पंचांग गणना और शास्त्रीय नियमों पर भी केंद्रित हो गई है. ऐसे में व्रत रखने वाली महिलाएं स्थानीय विद्वानों के मत के आधार पर तिथि का निर्णय लेने की सलाह दी जा रही है.

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