हाईकोर्ट ने उनकी सेवामुक्ति का आदेश रद्द कर दिया है. अदालत ने विभागीय जांच की प्रक्रिया में गंभीर खामियां पाते हुए बिहार सरकार और जेल प्रशासन की कार्रवाई को प्रक्रियात्मक रूप से त्रुटिपूर्ण और गैर-कानूनी माना है.

- पांच कैदियों के फरार होने के मामले में उपेंद्र दास को किया गया था बर्खास्त, करीब आठ साल बाद हाईकोर्ट ने पलटा आदेश
- मुख्य गवाहों की गवाही नहीं हुई, कागजी रिपोर्ट और अनुमानों के आधार पर हुई थी कार्रवाई; कोर्ट ने कहा- संदेह कानूनी सबूत का विकल्प नहीं
बक्सर टॉप न्यूज, बक्सर : सेंट्रल जेल से पांच कैदियों के फरार होने के बहुचर्चित मामले में बर्खास्त किए गए जेल वार्डर उपेंद्र दास को पटना हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है. हाईकोर्ट ने उनकी सेवामुक्ति का आदेश रद्द कर दिया है. अदालत ने विभागीय जांच की प्रक्रिया में गंभीर खामियां पाते हुए बिहार सरकार और जेल प्रशासन की कार्रवाई को प्रक्रियात्मक रूप से त्रुटिपूर्ण और गैर-कानूनी माना है.
ड्यूटी पर थे वार्डर, जेल से फरार हो गए पांच कैदी
मामला 30 और 31 दिसंबर 2016 की मध्य रात्रि का है. बक्सर सेंट्रल जेल के वार्ड नंबर 29 की खिड़की और दीवार तोड़कर पांच कैदी फरार हो गए थे. घटना के वक्त वार्डर उपेंद्र दास ड्यूटी पर तैनात थे. कैदियों के फरार होने के बाद जेल प्रशासन ने ड्यूटी में लापरवाही बरतने और कैदियों को भागने में मदद करने के आरोप लगाए.
तत्काल निलंबन, फिर हुई बर्खास्तगी
घटना के बाद उपेंद्र दास को निलंबित कर दिया गया. इसके बाद विभागीय कार्रवाई शुरू हुई और 19 जनवरी 2018 को उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया. वार्डर ने इस कार्रवाई को हाईकोर्ट में चुनौती दी. लंबे समय तक चले मामले की सुनवाई के बाद अब अदालत ने उनकी सेवामुक्ति का आदेश निरस्त कर दिया है.
जांच की प्रक्रिया पर ही कोर्ट ने उठाया सवाल
सुनवाई के दौरान विभागीय जांच की प्रक्रिया में कई गंभीर कमियां सामने आईं. कोर्ट के समक्ष यह बात आई कि उपेंद्र दास के खिलाफ कार्रवाई के लिए ठोस मौखिक साक्ष्य और गवाहों की गवाही का सहारा नहीं लिया गया. मुख्य रूप से कागजी रिपोर्ट और विभागीय दस्तावेजों के आधार पर आरोपों को सही मान लिया गया.
मुख्य गवाहों के बयान तक दर्ज नहीं कराए गए
हाईकोर्ट ने पाया कि बिहार सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम 17 के तहत जरूरी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया. जांच के दौरान मुख्य गवाहों के मौखिक बयान दर्ज नहीं कराए गए. जांच अधिकारी, पुलिस अधीक्षक या थाना प्रभारी जैसे महत्वपूर्ण लोगों की गवाही भी नहीं कराई गई.
सिर्फ रिपोर्ट से नहीं साबित हो सकता गंभीर आरोप
अदालत ने कहा कि किसी कर्मचारी के खिलाफ गंभीर आरोप लगाकर उसके सेवा संबंधी अधिकारों पर इतना बड़ा फैसला केवल कागजी रिपोर्ट या अनुमानों के आधार पर नहीं किया जा सकता. आरोपों को साबित करने के लिए निर्धारित विभागीय प्रक्रिया का पालन और साक्ष्यों की उचित जांच जरूरी है.
संदेह को सबूत नहीं माना जा सकता
फैसले में हाईकोर्ट ने सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि केवल संदेह या अनुमान कानूनी सबूत का विकल्प नहीं हो सकता. विभागीय कार्रवाई में भी आरोपों को उचित साक्ष्य और निर्धारित प्रक्रिया के माध्यम से साबित करना जरूरी है.
करीब आठ साल बाद बर्खास्तगी का आदेश रद्द
बक्सर जेल ब्रेक की घटना के बाद शुरू हुई कार्रवाई में उपेंद्र दास को वर्ष 2018 में सेवा से बर्खास्त किया गया था. अब हाईकोर्ट ने उनकी सेवामुक्ति के आदेश को रद्द कर दिया है. अदालत के इस फैसले से मामले में विभागीय कार्रवाई की प्रक्रिया और उसके आधार पर उठाए गए कदमों पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं.





.png)










0 Comments