भोजपुरी को संवैधानिक दर्जे की हुंकार, बक्सर से उठी आवाज ..

शब्दन फाउंडेशन और महाविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित 'संवाद श्रृंखला' के तहत 'भोजपुरी में संवैधानिक अधिकार' विषय पर हुए इस आयोजन में भाषा के इतिहास, वर्तमान स्थिति और आठवीं अनुसूची में शामिल कराने की जरूरत पर मंथन हुआ.


 





                           



  • सांसद सुधाकर सिंह बोले- सड़क से संसद तक बनाना होगा दबाव, तभी आठवीं अनुसूची की राह होगी आसान
  • विधायक ओमप्रकाश सिंह ने कहा- 40 करोड़ लोगों की भाषा के लिए दलीय सीमाओं से ऊपर उठना जरूरी

बक्सर टॉप न्यूज़, बक्सर : महर्षि विश्वामित्र महाविद्यालय के मानस सभागार में शनिवार को भोजपुरी के संवैधानिक अधिकार को लेकर राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित हुई. शब्दन फाउंडेशन और महाविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित 'संवाद श्रृंखला' के तहत 'भोजपुरी में संवैधानिक अधिकार' विषय पर हुए इस आयोजन में भाषा के इतिहास, वर्तमान स्थिति और आठवीं अनुसूची में शामिल कराने की जरूरत पर मंथन हुआ. मुख्य अतिथि सांसद सुधाकर सिंह, मुख्य वक्ता पूर्व मंत्री सह विधायक ओमप्रकाश सिंह, विषय प्रवर्तक भाषाविद् प्रो. दिवाकर पाण्डेय और अध्यक्षता कर रहे प्राचार्य प्रो. कृष्णा कांत सिंह ने अपने विचार रखे.

सांसद बोले- सिर्फ संसद में आवाज से नहीं, जनदबाव से बनेगी बात

सांसद सुधाकर सिंह ने कहा कि किसी समाज की अस्मिता, ज्ञान-परंपरा और अस्तित्व का सबसे बड़ा आधार उसकी भाषा होती है. उन्होंने कहा कि भोजपुरी भारत के साथ मॉरीशस, सूरीनाम, त्रिनिदाद, फिजी और गुयाना समेत कई देशों में बोली जाती है. इसके बावजूद इसे संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान नहीं मिल सका है.

उन्होंने कहा कि भोजपुरी भाषी समाज को संगठित होकर जनांदोलन और वैधानिक दबाव बनाना होगा. संसद में उठाई गई मांग तभी प्रभावी होगी, जब उसके पीछे मजबूत जनदबाव भी हो. सांसद ने बक्सर को महर्षि विश्वामित्र और भगवान श्रीराम की ज्ञानभूमि बताते हुए कहा कि वह संसद में भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में शामिल कराने की मांग को मजबूती से उठाएंगे.

विधायक बोले- भाषा की लड़ाई में पार्टी नहीं, भोजपुरी पहले

विधायक ओमप्रकाश सिंह ने कहा कि भोजपुरी को संवैधानिक अधिकार दिलाने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति जरूरी है. उन्होंने कहा कि करीब 40 करोड़ लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा को संवैधानिक स्वत्व नहीं मिलना गंभीर विषय है. भाषा के सवाल पर राजनीतिक दलों को अपनी सीमाओं से ऊपर उठकर एकमत होना होगा.

उन्होंने युवाओं और छात्राओं से अपनी मातृभाषा और सांस्कृतिक पहचान के संरक्षण के लिए आगे आने का आह्वान किया.

पाणिनि से कबीर तक भोजपुरी की परंपरा का जिक्र

प्रो. दिवाकर पाण्डेय ने भोजपुरी की प्राचीनता और भाषाई परंपरा पर प्रकाश डालते हुए पाणिनीय 'अष्टाध्यायी' में वर्णित 'कारूषी' भाषा का उल्लेख किया. उन्होंने कहा कि सिद्ध-नाथ परंपरा से लेकर संत कबीर तक भोजपुरी क्षेत्र की वाचिक और साहित्यिक परंपरा की लंबी कड़ी दिखाई देती है. उन्होंने संविधान की आठवीं अनुसूची में भाषाओं को शामिल किए जाने के स्पष्ट मानक के सवाल को भी उठाया.

प्राचार्य प्रो. कृष्णा कांत सिंह ने भोजपुरी में संबोधन करते हुए कहा कि मातृभाषा बोलने में संकोच छोड़ना होगा. भोजपुरी को केवल लोकगीत और उत्सव तक सीमित रखने के बजाय पाठ्य-पुस्तकों, अनुवाद और उच्च अकादमिक शोध की भाषा बनाने की जरूरत है. उन्होंने कहा कि ज्ञान-सृजन के माध्यम से ही भोजपुरी की पहचान को व्यापक बनाया जा सकता है.

47 छात्र-छात्राओं को मिला मेडल और प्रशस्ति-पत्र

संगोष्ठी के बाद प्रतिभा सम्मान समारोह आयोजित हुआ. महाविद्यालय के विभिन्न विभागों में हुई निबंध प्रतियोगिता में प्रथम, द्वितीय और तृतीय स्थान पाने वाले कुल 47 छात्र-छात्राओं को सांसद सुधाकर सिंह और अन्य अतिथियों ने मेडल व प्रशस्ति-पत्र देकर सम्मानित किया.

कार्यक्रम का संचालन शब्दन फाउंडेशन के संयोजक शिवेंद्र सिंह राणा ने किया. हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. पंकज कुमार चौधरी ने धन्यवाद ज्ञापित किया. मौके पर महाविद्यालय के प्राध्यापक, शिक्षकेतर कर्मचारी, शोधार्थी और बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं मौजूद रहे. राष्ट्रगान के सामूहिक गान के साथ संगोष्ठी का समापन हुआ.
















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