जौहर कायरता नहीं, वीरांगनाओं के त्याग और पति-परायणता की गाथा : आचार्य श्रीपौराणिक

भारतीय परंपरा में नारी के स्थान, सतीत्व धर्म और ऐतिहासिक जौहर की अवधारणा पर विस्तार से अपने विचार रखे हैं. उन्होंने वैदिक और सनातन ग्रंथों के विभिन्न संदर्भों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति में माता को सर्वोच्च सम्मान दिया गया है.






                             


  • सनातन परंपरा में नारी को भोग्या नहीं, पूज्या माना गया है, सतीत्व को बताया धर्म और शक्ति का प्रतीक
  • क्षत्राणियों के जौहर को लेकर बोले आचार्य, कहा- मातृभूमि के लिए बलिदान देने वाले वीरों की पत्नियों ने भी दिखाई अदम्य निष्ठा

बक्सर टॉप न्यूज़, बक्सर : जौहर को केवल कायरता या आत्मदाह के रूप में देखने के बजाय इसे भारतीय इतिहास और सनातन परंपरा में पति-परायणता, त्याग और वीरांगनाओं के अदम्य साहस से जोड़कर देखने की जरूरत है। यह विचार सिद्धाश्रम धाम बक्सर के आचार्य श्रीपौराणिक ने व्यक्त किया है। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में नारी को सदैव सम्मान और सर्वोच्च स्थान दिया गया है तथा सतीत्व को आंतरिक शक्ति, संयम और चरित्रबल का प्रतीक माना गया है.

आचार्य श्रीपौराणिक ने बुधवार को जारी अपने लेख में भारतीय परंपरा में नारी के स्थान, सतीत्व धर्म और ऐतिहासिक जौहर की अवधारणा पर विस्तार से अपने विचार रखे हैं. उन्होंने वैदिक और सनातन ग्रंथों के विभिन्न संदर्भों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति में माता को सर्वोच्च सम्मान दिया गया है.

‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते’ से नारी सम्मान की परंपरा

आचार्य ने मनुस्मृति के प्रसिद्ध कथन ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:’ का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय परंपरा में स्त्री के सम्मान को परिवार और समाज के कल्याण से जोड़ा गया है। उनका कहना है कि भारतीय संस्कृति में कन्या को विवाह से पूर्व सम्मानित स्थान दिया जाता है और विवाह संस्कार के बाद भी उसे देवी के रूप में संबोधित करने की परंपरा रही है.

उन्होंने कहा कि सनातन वैदिक परंपरा में विवाह केवल सामाजिक समझौता नहीं, बल्कि संस्कार और जीवनभर एक-दूसरे का साथ निभाने की प्रतिज्ञा माना गया है. अग्नि को साक्षी मानकर लिए जाने वाले सात फेरों और अन्य वैवाहिक परंपराओं का उद्देश्य पति-पत्नी के बीच जीवनभर के दायित्व और समर्पण को स्थापित करना रहा है.

सतीत्व को बताया आंतरिक शक्ति का प्रतीक

आचार्य श्रीपौराणिक ने अपने लेख में माता अनसूया, माता कौशल्या, देवी देवकी और माता सीता जैसे धार्मिक प्रसंगों का उल्लेख करते हुए सतीत्व को भारतीय परंपरा में शक्ति और तपस्या का प्रतीक बताया है. उन्होंने कहा कि भारतीय धार्मिक आख्यानों में ऐसी महिलाओं के चरित्र को आदर्श के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी अपने संकल्प, मर्यादा और आत्मबल को बनाए रखा.

उन्होंने रामायण के प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि माता सीता ने रावण के सामने भी अपने आत्मसम्मान और पति के प्रति निष्ठा से समझौता नहीं किया. उनके अनुसार, ऐसे प्रसंग भारतीय साहित्य और धार्मिक परंपरा में नारी के चरित्रबल को रेखांकित करते हैं.

जौहर को बताया वीरांगनाओं की अंतिम यात्रा

लेख के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से में आचार्य श्रीपौराणिक ने ऐतिहासिक जौहर की परंपरा को लेकर अपने विचार रखे हैं. उन्होंने कहा कि युद्ध के मैदान में जब राजपूत और अन्य क्षत्रिय योद्धा मातृभूमि की रक्षा के लिए अंतिम संघर्ष करने निकलते थे और उनके जीवित लौटने की संभावना समाप्त हो जाती थी, तब उनकी पत्नियों के सामने भी कठिन परिस्थितियां उत्पन्न होती थीं.

आचार्य के अनुसार, ऐसी परिस्थितियों में कई क्षत्राणियों ने जौहर का मार्ग चुना। उन्होंने इसे अपने पति के प्रति अंतिम निष्ठा और उस दौर की सामाजिक-धार्मिक मान्यताओं से जुड़ी एक कठोर परंपरा के रूप में प्रस्तुत किया है. उनका कहना है कि इसे केवल भय या कायरता के चश्मे से देखना उस दौर की परिस्थितियों और उन महिलाओं की मानसिकता को पूरी तरह समझने में सक्षम नहीं है.

इतिहास, आस्था और आधुनिक दृष्टिकोण पर बहस

आचार्य ने अपने लेख में जौहर और सतीत्व को लेकर एक स्पष्ट धार्मिक-सांस्कृतिक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है. उन्होंने ऐसी महिलाओं को श्रद्धांजलि दी, जिन्हें वे सनातन परंपरा, परिवार और पति के प्रति पूर्ण समर्पण का उदाहरण मानते हैं.

हालांकि, जौहर और सती प्रथा जैसे ऐतिहासिक विषय आज भी इतिहासकारों और समाजशास्त्रियों के बीच गंभीर विमर्श का विषय हैं. आधुनिक दृष्टिकोण में महिलाओं की इच्छा, सामाजिक दबाव, युद्धकालीन परिस्थितियों और उस समय की राजनीतिक-सामाजिक संरचना को भी समझने पर जोर दिया जाता है. ऐसे में जौहर को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण इतिहास और समाज में मौजूद रहे हैं.

आचार्य श्रीपौराणिक ने अपने लेख के अंत में कहा कि उनका यह लेख उन महिलाओं को समर्पित है, जिन्हें भारतीय परंपरा में सतीत्व, त्याग और चरित्रबल की प्रतीक माना गया है. उन्होंने ऐसी वीरांगनाओं को बार-बार नमन करते हुए कहा कि उनके त्याग की गाथाएं भारतीय सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा बनी हुई हैं.













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