कहा कि यदि बच्चों में पढ़ने, लिखने, समझने और नवाचार करने की आदत विकसित करनी है, तो इसकी शुरुआत शिक्षकों से ही होनी चाहिए. शिक्षक जब खुद पढ़ता और लिखता है, तभी वह विद्यार्थियों के सामने सीखने और सृजन करने का प्रभावी उदाहरण बन पाता है.
- फाउंडेशन स्कूल में सजा ऐसा मंच, जहां कक्षा लेने वाले शिक्षक बने लेखक
- ‘आत्मज्योति’ में अनुभव, संवेदना और नवाचार को शब्दों में पिरोया, शिक्षा जगत के दिग्गजों ने की सराहना
बक्सर टॉप न्यूज़, बक्सर : शिक्षक दिवस पर बक्सर के फाउंडेशन स्कूल में इस बार गुरुजनों को सम्मान देने का अंदाज कुछ अलग रहा. यहां शिक्षकों के हाथों में सिर्फ चॉक और किताबें ही नहीं, बल्कि उनकी अपनी रचनाओं से सजी पुस्तक भी नजर आई. अवसर था फाउंडेशन स्कूल एवं जी.डी. मिश्रा इंस्टीट्यूट ऑफ हायर स्टडीज के शिक्षकों एवं प्रोफेसरों द्वारा रचित पुस्तक ‘आत्मज्योति’ के भव्य विमोचन का. विद्यालय परिसर में आयोजित समारोह में शिक्षा जगत की विभिन्न धाराओं से जुड़े शिक्षक, शिक्षिकाएं, प्राचार्य, निदेशक और गणमान्य अतिथि एक मंच पर जुटे.
एक मंच पर दिखा शिक्षा का पूरा संसार
कार्यक्रम में आंगनबाड़ी सेविकाओं से लेकर प्राथमिक एवं मध्य विद्यालयों के शिक्षक-शिक्षिकाएं, हाई स्कूल एवं इंटर विद्यालयों के शिक्षक तथा महाविद्यालयों के प्रोफेसर शामिल हुए. बक्सर के विभिन्न विद्यालयों के प्राचार्य और निदेशक भी आयोजन के साक्षी बने. कार्यक्रम की मुख्य अतिथि डी.डी.सी., बक्सर रहीं. फाउंडेशन स्कूल के निदेशक प्रदीप कुमार मिश्रा और मान्या मिश्रा की मौजूदगी ने समारोह की गरिमा बढ़ाई. अतिथियों का पुष्पगुच्छ देकर स्वागत किया गया.
दीप जला तो मंच पर उतर आई गुरु की रचनात्मकता
कार्यक्रम की शुरुआत डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के चित्र पर माल्यार्पण और दीप प्रज्वलन के साथ हुई. इसके बाद विद्यार्थियों ने कुचिपुड़ी नृत्य की मनमोहक प्रस्तुति देकर माहौल को जीवंत कर दिया. नन्हे विद्यार्थियों ने आत्मविश्वास और अनुशासन के साथ अतिथियों का स्वागत किया, जिसकी उपस्थित लोगों ने जमकर सराहना की.
‘आत्मज्योति’ में शिक्षक बने अपने ही अनुभवों के कथाकार
विद्यालय के प्राचार्य मनोज कुमार त्रिगुण ने कहा कि यदि बच्चों में पढ़ने, लिखने, समझने और नवाचार करने की आदत विकसित करनी है, तो इसकी शुरुआत शिक्षकों से ही होनी चाहिए. शिक्षक जब खुद पढ़ता और लिखता है, तभी वह विद्यार्थियों के सामने सीखने और सृजन करने का प्रभावी उदाहरण बन पाता है. इसी विचार को ‘आत्मज्योति’ के रूप में आकार दिया गया है.
उन्होंने बताया कि पुस्तक में शिक्षकों ने अपने अनुभवों, विचारों और रचनात्मक दृष्टिकोण को शब्द दिए हैं. खास बात यह है कि लगभग समान सामाजिक और शैक्षिक परिवेश में काम करने वाले शिक्षकों ने भी अपनी संवेदनाओं और अनुभवों को अलग-अलग अंदाज में अभिव्यक्त किया है.
आंगनबाड़ी से महाविद्यालय तक के शिक्षकों को मिला सम्मान
प्राचार्य ने शिक्षा व्यवस्था की नींव मजबूत करने में आंगनबाड़ी सेविकाओं और शिक्षिकाओं की भूमिका को भी रेखांकित किया. उन्होंने कहा कि राष्ट्र निर्माण की पहली पाठशाला को मजबूत करने में इनकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है. उन्होंने जिले के अलग-अलग क्षेत्रों में शिक्षा के माध्यम से समाज और राष्ट्र निर्माण में योगदान दे रहे शिक्षकों की सराहना की.
उन्होंने कहा कि विद्यालय के मेंटर डॉ. राजेश्वर मिश्रा के मार्गदर्शन और विद्यालय में निरंतर नवाचार की सोच को मूर्त रूप देने की दिशा में ‘आत्मज्योति’ एक सार्थक प्रयास है.
मुख्य अतिथि ने याद की अपनी पहली गुरु
मुख्य अतिथि डी.डी.सी. ने विद्यालय की वार्षिक पुस्तिका का विमोचन किया. अपने संबोधन में उन्होंने गुरु के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला. उन्होंने अपने जीवन की प्रिय शिक्षिका के रूप में अपनी माता का उल्लेख करते हुए विद्यालयी जीवन में मिले गुरुजनों के योगदान को याद किया. उन्होंने सभी शिक्षकों को शिक्षक दिवस की शुभकामनाएं दीं और समाज निर्माण में उनके समर्पण की सराहना की.
शिक्षक सिर्फ पढ़ाए नहीं, खुद भी सीखें और रचें
फाउंडेशन स्कूल के निदेशक प्रदीप कुमार मिश्रा ने शिक्षकों द्वारा अपने नियमित दायित्वों से आगे बढ़कर लेखन और पठन जैसे रचनात्मक कार्यों को अपनाने की सराहना की. उन्होंने कहा कि शिक्षक की सीखने और सृजन करने की प्रवृत्ति ही विद्यार्थियों में नई सोच और रचनात्मकता का बीजारोपण करती है.
मान्या मिश्रा ने कहा कि आज की युवा पीढ़ी के लिए सकारात्मक सोच, रचनात्मकता, दूरदर्शिता और नेतृत्व क्षमता बेहद जरूरी है. इन गुणों का विकास विद्यालयी जीवन से ही किया जाना चाहिए, ताकि विद्यार्थी आगे चलकर जिम्मेदार और सक्षम नागरिक बन सकें.
संपादकीय दल को मिला सम्मान
कार्यक्रम के दौरान जी.डी. मिश्रा इंस्टीट्यूट ऑफ हायर स्टडीज के प्राचार्य ने ‘आत्मज्योति’ के संपादकीय दल के कठिन परिश्रम, टीमवर्क और समर्पण की सराहना की. संपादकीय दल को सम्मानित भी किया गया. समारोह के अंत में डॉ. एस.के. दुबे ने अतिथियों, शिक्षकों, शिक्षिकाओं और आयोजन से जुड़े सभी सदस्यों के प्रति आभार जताया.
शिक्षक दिवस का यह आयोजन इस मायने में खास रहा कि यहां शिक्षकों को केवल उनके अध्यापन के लिए नहीं, बल्कि उनकी लेखनी, सृजनशीलता, अनुभव और नए विचारों को जन्म देने की क्षमता के लिए भी सम्मान मिला. ‘आत्मज्योति’ के रूप में शिक्षकों ने यह संदेश भी दिया कि जो गुरु दूसरों के जीवन में ज्ञान का प्रकाश फैलाता है, उसकी अपनी कलम भी समाज को रोशन कर सकती है.
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