विजयादशमी महोत्सव : वृंदा के श्राप से पत्थर बने भगवान विष्णु, तुलसी के रूप में अमर हुईं पतिव्रता नारी ..

वृंदा के पतिव्रत धर्म और भगवान विष्णु के शालिग्राम स्वरूप में पूजे जाने के प्रसंग ने दर्शकों को भक्ति और भावनाओं से जोड़ दिया. श्री रामलीला समिति, बक्सर के तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम में कलाकारों ने अपने अभिनय से पौराणिक कथा को मंच पर जीवंत कर दिया.




                           





  • जालंधर वध की लीला में शिव-दानव युद्ध ने बांधा समां
  • वृंदा की पीड़ा और तुलसी प्राकट्य के प्रसंग ने भावुक किए दर्शक

बक्सर टॉप न्यूज, बक्सर : नगर के ऐतिहासिक किला मैदान में चल रहे 20 दिवसीय विजयादशमी महोत्सव में गुरुवार को जालंधर वध की लीला का भावपूर्ण मंचन किया गया. भगवान शिव और दानवराज जालंधर के बीच भीषण युद्ध, वृंदा के पतिव्रत धर्म और भगवान विष्णु के शालिग्राम स्वरूप में पूजे जाने के प्रसंग ने दर्शकों को भक्ति और भावनाओं से जोड़ दिया. श्री रामलीला समिति, बक्सर के तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम में कलाकारों ने अपने अभिनय से पौराणिक कथा को मंच पर जीवंत कर दिया.

वृंदावन से आए बाल कृष्ण रासलीला एवं रामलीला मंडल के कलाकारों ने स्वामी मोहन श्याम भारद्वाज के निर्देशन में जालंधर वध प्रसंग प्रस्तुत किया. लीला में दिखाया गया कि भगवान शिव के तेज से समुद्र में जालंधर का प्राकट्य हुआ था. उसका विवाह भगवान विष्णु की परम भक्त वृंदा से हुआ. वृंदा के पतिव्रत धर्म के प्रभाव से जालंधर को विशेष शक्ति प्राप्त थी, जिसके बल पर वह देवताओं को चुनौती देने लगा.

कैलाश में शिव और जालंधर के बीच भीषण युद्ध

कथा के अनुसार, शक्ति के मद में चूर जालंधर देवताओं पर अत्याचार करने लगा और स्वर्ग पर अधिकार जमाने की कोशिश करने लगा. उसके आतंक से परेशान इंद्रदेव ने देवर्षि नारद की सलाह पर भगवान शिव से सहायता मांगी. इसी क्रम में जालंधर भी कैलाश पहुंच गया, जहां भगवान शिव और उसके बीच भीषण युद्ध हुआ.


जालंधर की शक्ति का रहस्य उसकी पत्नी वृंदा का अखंड पतिव्रत धर्म था. लीला में दिखाया गया कि भगवान विष्णु ने जालंधर का रूप धारण कर वृंदा के आश्रम में प्रवेश किया. पति के रूप में आए भगवान विष्णु को पहचान नहीं पाने के कारण वृंदा का पतिव्रत धर्म भंग हो गया. इसके बाद भगवान शिव ने युद्ध में जालंधर का वध कर देवताओं को उसके अत्याचारों से मुक्त कराया.

वृंदा के श्राप से शालिग्राम और तुलसी का प्राकट्य

जब वृंदा को भगवान विष्णु की लीला का सत्य पता चला, तो वह गहरे दुख में डूब गई. अपने विश्वास को ठेस पहुंचने से आहत वृंदा ने भगवान विष्णु को पत्थर बन जाने का श्राप दे दिया. पौराणिक मान्यता के अनुसार, इसी श्राप के कारण भगवान विष्णु शालिग्राम शिला के रूप में पूजे जाने लगे. इसके बाद वृंदा ने अपना शरीर त्याग दिया और उनकी पवित्रता के प्रतीक के रूप में तुलसी का प्राकट्य हुआ.

लीला में वृंदा की पीड़ा, शिव-जालंधर युद्ध और तुलसी प्राकट्य के दृश्यों ने दर्शकों को भावविभोर कर दिया. तुलसी और शालिग्राम की धार्मिक महत्ता के माध्यम से भक्ति, विश्वास, त्याग और धर्म का संदेश दिया गया.

श्री रामलीला समिति की ओर से आयोजित यह महोत्सव भारतीय पौराणिक कथाओं और लोकनाट्य परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम बना हुआ है.












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