हैरानी की बात यह रही कि न्यायिक अधिकारी के फोन करने और सिविल सर्जन की ओर से तत्काल इलाज का आश्वासन दिए जाने के बावजूद हड्डी रोग विशेषज्ञ उपलब्ध नहीं हो सके. आखिरकार घायल महिला कर्मचारी को अस्पताल के ही एक डॉक्टर के निजी क्लिनिक में जाकर 9,894 रुपये खर्च कर पैर में प्लास्टर कराना पड़ा.

- सड़क दुर्घटना में घायल कोर्ट कर्मी करीब दो घंटे तक करती रही इंतजार, निजी क्लिनिक में 9,894 रुपये खर्च कर कराना पड़ा प्लास्टर
- पॉक्सो कोर्ट के विशेष न्यायाधीश ने मांगा जवाब, संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं मिलने पर कानूनी कार्रवाई और स्वास्थ्य सचिव को रिपोर्ट भेजने की चेतावनी
बक्सर टॉप न्यूज़, बक्सर : सदर अस्पताल बक्सर की स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल उस समय खुल गई, जब सड़क दुर्घटना में घायल व्यवहार न्यायालय की एक महिला कर्मचारी को करीब दो घंटे तक इलाज के लिए इंतजार करना पड़ा. हैरानी की बात यह रही कि न्यायिक अधिकारी के फोन करने और सिविल सर्जन की ओर से तत्काल इलाज का आश्वासन दिए जाने के बावजूद हड्डी रोग विशेषज्ञ उपलब्ध नहीं हो सके. आखिरकार घायल महिला कर्मचारी को अस्पताल के ही एक डॉक्टर के निजी क्लिनिक में जाकर 9,894 रुपये खर्च कर पैर में प्लास्टर कराना पड़ा. इस गंभीर मामले को लेकर पॉक्सो कोर्ट के अनन्य विशेष न्यायाधीश-सह-अपर सत्र न्यायाधीश षष्ठम् अमित कुमार शर्मा ने सिविल सर्जन को कारण बताओ नोटिस जारी कर जवाब मांगा है.
ड्यूटी पर आते समय हादसा, अस्पताल में बंद मिला डॉक्टर का कमरा
न्यायालय की ओर से जारी नोटिस के अनुसार, 30 अक्टूबर 2026 को व्यवहार न्यायालय बक्सर की उच्च वर्गीय लिपिक आरती कुमारी ड्यूटी पर आने के दौरान सड़क दुर्घटना में घायल हो गईं. उनके पैर में गंभीर चोट लगी थी और काफी सूजन थी. असहनीय दर्द से परेशान आरती को न्यायालय के दो कर्मचारी सुनील कुमार और संतोष कुमार सुबह करीब 10:30 बजे सदर अस्पताल लेकर पहुंचे.
अस्पताल में सरकारी पर्ची कटवाने के बाद आपातकालीन वार्ड में डॉक्टर से जांच कराई गई. डॉक्टर की सलाह पर एक्स-रे भी कराया गया. इसके बाद हड्डी रोग विशेषज्ञ से दिखाने के लिए कमरा नंबर 13 भेजा गया, लेकिन वहां ताला लटका मिला. अस्पताल कर्मियों ने बताया कि डॉक्टर अभी नहीं आए हैं.
इसके बाद दोनों कर्मचारी सिविल सर्जन, डिप्टी सर्जन और चिकित्सा पदाधिकारी के कार्यालय पहुंचे, लेकिन वहां भी संबंधित अधिकारी मौजूद नहीं मिले. कर्मचारियों को बताया गया कि साहब अभी नहीं आए हैं.
जज ने किया फोन, फिर भी नहीं पहुंचा डॉक्टर
मामले की गंभीरता को देखते हुए विशेष न्यायाधीश अमित कुमार शर्मा ने खुद सिविल सर्जन से फोन पर संपर्क किया. सिविल सर्जन ने तत्काल समुचित इलाज की व्यवस्था कराने का भरोसा दिया. इसके बाद न्यायालय कर्मी संतोष कुमार ने भी दोबारा फोन कर स्थिति की जानकारी दी. उन्हें भी व्यवस्था किए जाने का आश्वासन मिला.
इसके बावजूद दोपहर 12 बजे तक कोई हड्डी रोग विशेषज्ञ इलाज के लिए नहीं पहुंचा. करीब डेढ़ से दो घंटे तक इंतजार करने और घायल महिला की परेशानी बढ़ने के बाद सहकर्मी उन्हें महामाया क्लिनिक ले गए.
नोटिस में उल्लेख किया गया है कि यह निजी क्लिनिक सदर अस्पताल के डॉक्टर विकास पाण्डेय द्वारा संचालित बताया गया है. वहां आरती कुमारी के पैर में प्लास्टर किया गया, जिसके एवज में उन्हें 9,894 रुपये का भुगतान करना पड़ा.
न्यायाधीश की टिप्पणी से स्वास्थ्य विभाग में हलचल
न्यायाधीश अमित कुमार शर्मा ने नोटिस में अस्पताल की व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए हैं. उन्होंने टिप्पणी की है कि जब न्यायिक पदाधिकारी और न्यायालय कर्मियों के लगातार संपर्क करने तथा आश्वासन मिलने के बावजूद एक न्यायालय कर्मचारी के इलाज की व्यवस्था नहीं हो सकी, तो सदर अस्पताल में आम लोगों की जांच और इलाज किस स्तर पर होता होगा, इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है.
उन्होंने सिविल सर्जन से स्पष्टीकरण मांगा है कि आखिर किन परिस्थितियों में करीब दो घंटे तक हड्डी रोग विशेषज्ञ की व्यवस्था नहीं हो सकी और घायल महिला को निजी क्लिनिक का रुख करना पड़ा.
नोटिस में यह भी पूछा गया है कि संतोषजनक जवाब नहीं मिलने की स्थिति में उनके विरुद्ध कानूनी कार्रवाई क्यों नहीं की जाए और पूरे मामले की रिपोर्ट बिहार सरकार के स्वास्थ्य विभाग के सचिव को क्यों नहीं भेजी जाए.
इस नोटिस की प्रतिलिपि सचिव, डीएलएससी बक्सर को भी भेजी गई है, ताकि आगामी डीएलएमसी की बैठक में इस गंभीर मामले को प्रमुखता से उठाया जा सके. अब न्यायिक हस्तक्षेप के बाद स्वास्थ्य विभाग से जवाब और सदर अस्पताल की व्यवस्था पर कार्रवाई का इंतजार है.





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